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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 1083 of 1098

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Page 1083
* अध्याय २८६ *१०७३

| आयुधं चापि वासश्च भवाद्युद्धर मामतः।<br>इत्यामन्त्र्य च यो दद्याद् विश्वचक्रं विमत्सरः ॥ १८<br>विमुक्तः सर्वपापेभ्यो विष्णुलोके महीयते।<br>वैकुण्ठलोकमासाद्य चतुर्बाहुः सनातनः ॥ १९<br>सेव्यतेऽप्सरसां सङ्घैस्तिष्ठेत् कल्पशतत्रयम्।<br>प्रणमेद् वाथ यः कृत्वा विश्वचक्रं दिने दिने।<br>तस्यायुर्वर्धते नित्यं लक्ष्मीश्च विपुला भवेत् ॥ २०<br>इति सकलजगत्सुराधिवासं<br>वितरति यस्तपनीयषोडशारम्।<br>हरिभवनमुपागतः स सिद्ध-<br>श्चिरमभिगम्य नमस्यते शिरोभिः ॥ २१<br>असुदर्शनतां प्रयाति शत्रो-<br>र्मदनसुदर्शनतां च कामिनीभ्यः।<br>स सुदर्शनकेशवानुरूपः<br>कनकसुदर्शनदानदग्धपापः ॥ २२<br>कृतगुरुदुरितानि षोडशार-<br>प्रवितरणे प्रवराकृतिर्मुरारेः।<br>अभिभवति भवोद्भवन्ति भित्त्वा<br>भवमभितो भवने भयानि भूयः ॥ २३ | भगवान्‌का आयुध तथा उनका निवासस्वरूप भी है, अतः इस भवसे मेरा उद्धार करें।' इस प्रकार आमन्त्रित करके जो मनुष्य मत्सररहित हो इस विश्वचक्रका दान करता है, वह सभी पापोंसे छूटकर विष्णुलोकमें पूजित होता है तथा वैकुण्ठलोकको प्राप्तकर चार भुजाओंसे युक्त और अविनाशी हो जाता है तथा अप्सरासमूहोंद्वारा सेवित होकर तीन सौ कल्पोंतक वहाँ निवास करता है। अथवा जो व्यक्ति इस विश्वचक्रका निर्माण कर इसे प्रतिदिन प्रणाम करता है, उसकी आयु बढ़ती है और नित्य लक्ष्मीकी वृद्धि होती है। इस प्रकार जो व्यक्ति सुवर्णनिर्मित सोलह अरोंसे युक्त तथा समस्त जगत् एवं देवताओंके अधिष्ठानरूप इस चक्रको वितरित करता है, वह विष्णु-भवनको प्राप्त होता है तथा उसे सिद्धगण सिर झुकाकर नमस्कार करते हैं। वह पुरुष स्वर्णनिर्मित सुदर्शनके दानसे निष्पाप होकर शत्रुओंको विकराल रूपमें तथा कामिनियोंको मदनकी भाँति सुन्दर कमनीयरूपमें दिखायी पड़ता है और शुभदर्शन केशवकी भाँति मनोरम स्वरूप धारण करता है। इस सोलह अरोंवाले सुवर्णनिर्मित चक्रके दान करनेसे किये गये महापाप शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं और कर्ता मुरारिकी श्रेष्ठ आकृति प्राप्त करता है तथा भव-भयका भेदन कर बार-बार जन्म-मरणके भयसे भी छूट जाता है ॥ १२—२३ ॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे महादानानुकीर्तने विश्वचक्रप्रदानविधिर्नाम पञ्चाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २८५ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें महादान-वर्णन-प्रसंगमें विश्वचक्रप्रदान-विधि नामक दो सौ पचासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ २८५ ॥


दो सौ छियासीवाँ अध्याय

कनककल्पलतादानकी विधि

मत्स्य उवाच
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि महादानमनुत्तमम्।<br>महाकल्पलता नाम महापातकनाशनम् ॥ १<br><br>पुण्यां तिथिंमथासाद्य कृत्वा ब्राह्मणवाचनम्।<br>ऋत्विङ्मण्डपसम्भारभूषणाच्छादनादिकम् ॥ २<br><br>तुलापुरुषवत् कुर्याल्लोकेशावाहनं बुधः।<br>चामीकरमयीः कुर्याद् दश कल्पलताः समाः ॥ ३मत्स्यभगवान्‌ने कहा— इसके बाद मैं महापापोंको नष्ट करनेवाले परमोत्तम महाकल्पलता नामक महादानकी विधि बतला रहा हूँ। बुद्धिमान् यजमान किसी पुण्यतिथिके दिन पुण्याहवाचन करके पूर्वकथित तुलापुरुष-दानके समान ऋत्विज्, मण्डप, पूजन-सामग्री, आभूषण और आच्छादन आदिका प्रबन्ध करे तथा उसी प्रकार लोकपालोंका आवाहन करे। कल्पलता-दानके लिये सुवर्णनिर्मित समान परिमाणकी दस कल्पलताएँ बनवाये,