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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 1082 of 1098

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Page 1082
१०७२* मत्स्यपुराण *

| तस्यार्धेन कनिष्ठं स्याद् विश्वचक्रमुदाहृतम्।<br>अन्यद् विंशात् पलादूर्ध्वमशक्तोऽपि निवेदयेत्॥ ३<br>षोडशारं ततश्चक्रं भ्रमन्नेम्यष्टकावृतम्।<br>नाभिपद्मे स्थितं विष्णुं योगारूढं चतुर्भुजम्॥ ४<br>शङ्खचक्रेऽस्य पार्श्वे तु देव्यष्टकसमावृतम्।<br>द्वितीयावरणे तद्वत् पूर्वतो जलशायिनम्॥ ५<br>अत्रिर्भृगुर्वसिष्ठश्च ब्रह्मा कश्यप एव च।<br>मत्स्यः कूर्मो वराहश्च नरसिंहोऽथ वामनः॥ ६<br>रामो रामश्च कृष्णश्च बुद्धः कल्कीति वै क्रमात्।<br>तृतीयावरणे गौरी मातृभिर्वसुभिर्युता॥ ७<br>चतुर्थे द्वादशादित्या वेदाश्चत्वार एव च।<br>पञ्चमे पञ्च भूतानि रुद्राश्चैकादशैव तु॥ ८<br>लोकपालाष्टकं षष्ठे दिङ्मातङ्गास्तथैव च।<br>सप्तमेऽस्त्राणि सर्वाणि मङ्गलानि च कारयेत्॥ ९<br>अन्तरान्तरतो देवान् विन्यसेदष्टमे पुनः।<br>तुलापुरुषवच्छेषं समन्तात् परिकल्पयेत्॥ १०<br>ऋत्विङ्मण्डपसम्भारभूषणाच्छादनादिकम् ।<br>विश्वचक्रं ततः कुर्यात् कृष्णाजिनतिलोपरि॥ ११ | ढाई सौ पलका कनिष्ठ कहा गया है। अल्प वित्तवाला मनुष्य अन्य प्रकारसे बीस पलसे ऊपरका बना हुआ विश्वचक्र दान कर सकता है। यह चक्र सोलह अरों तथा आठ नेमियोंसे युक्त घूमता हुआ होना चाहिये। उसके नाभि-कमलपर योगारूढ चतुर्भुज विष्णुको स्थापित करना चाहिये। उनके बगलमें शङ्ख और चक्र हों तथा आठ देवियाँ उन्हें चारों ओरसे घेरे हुए हों। उसके दूसरे आवरणमें उसी प्रकार जलशायी, अत्रि, भृगु, वसिष्ठ, ब्रह्मा, कश्यप, मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंह, वामन, रामचन्द्र, परशुराम, कृष्ण, बुद्ध और कल्कि को, तीसरे आवरणमें मातृकाओं तथा वसुओंसहित गौरीको, चतुर्थ आवरणमें बारहों आदित्यों तथा चारों वेदोंको, पाँचवें आवरणमें पाँचों महाभूतों तथा ग्यारहों रुद्रको, छठे आवरणमें आठों लोकपालों तथा दिग्गजोंको, सप्तम आवरणमें सभी प्रकारके माङ्गलिक अस्त्रोंको तथा अष्टम आवरणमें थोड़े-थोड़े अन्तरपर देवताओंको स्थापित करे। शेष कार्य तुला-पुरुष-दानकी तरह करना चाहिये। उसी तरह ऋत्विज्, मण्डप, पूजन-सामग्री, भूषण और आच्छादन आदिको भी रखना चाहिये। फिर उक्त विश्वचक्रको कृष्णमृगचर्मपर रखे गये तिलके ऊपर स्थापित करना चाहिये॥ १—११॥ |
| तथाष्टादश धान्यानि रसांश्च लवणादिकान्।<br>पूर्णकुम्भाष्टकं चैव वस्त्राणि विविधानि च॥ १२<br>माल्येक्षुफलरत्नानि वितानं चापि कारयेत्।<br>ततो मङ्गलशब्देन स्नातः शुक्लाम्बरो गृही।<br>होमाधिवासनान्ते वै गृहीतकुसुमाञ्जलिः॥ १३<br>इममुच्चारयेन्मन्त्रं त्रिः कृत्वा तु प्रदक्षिणम्।<br>नमो विश्वमयायेति विश्वचक्रात्मने नमः॥ १४<br>परमानन्दरूपी त्वं पाहि नः पापकर्दमात्।<br>तेजोमयमिदं यस्मात् सदा पश्यन्ति योगिनः॥ १५<br>हृदि तत्त्वं गुणातीतं विश्वचक्रं नमाम्यहम्।<br>वासुदेवे स्थितं चक्रं चक्रमध्ये तु माधवः॥ १६<br>अन्योन्याधाररूपेण प्रणमामि स्थिताविह।<br>विश्वचक्रमिदं यस्मात् सर्वपापहरं परम्॥ १७ | फिर अठारह प्रकारके अन्न, लवण आदि सभी रस, जलसे भरे हुए आठ माङ्गलिक कलश, विविध प्रकारके वस्त्र, पुष्पमाला, ईख, फल, रत्न, वितान—इन सबको भी यथास्थान रखना चाहिये। तदनन्तर माङ्गलिक शब्दोंके साथ गृहस्थ यजमान स्नान करके श्वेत वस्त्र धारणकर हवन एवं अधिवासनके उपरान्त अञ्जलिमें पुष्प ग्रहणकर तीन बार प्रदक्षिणा करे और इस मन्त्रका उच्चारण करे—'विश्वमयको नमस्कार है। विश्वचक्रात्माको प्रणाम है। तुम परमानन्दस्वरूप हो, अतः पापरूप कीचड़से हमारी रक्षा करो। चूँकि इस तत्त्वस्वरूप, गुणातीत, तेजोमय विश्वचक्रको योगीलोग सदा अपने हृदयमें देखते हैं, अतः मैं तुम्हें नमस्कार करता हूँ। यह विश्वचक्र वासुदेवमें स्थित है और माधव इस चक्रके मध्य भागमें स्थित हैं, इस प्रकार तुम दोनों अन्योन्याधाररूपसे स्थित हो, तुम्हें मैं प्रणाम करता हूँ। चूँकि यह विश्वचक्र सम्पूर्ण पातकोंका विनाश करनेवाला, |