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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

Page 552 of 649

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Page 552

४१२ मनुस्मृति ।

है। या अश्वमेध यज्ञ में ब्राह्मण और राजा के सामने अपना
पाप कहकर, अवभृथ-स्नान करने पर ब्रह्महत्या से मुक्त होता है।
ब्राह्मण धर्म का मूल और क्षत्रिय अग्रभाग कहलाता है, इस लिए
उनके सामने पाप कहकर शुद्ध होजाता है ॥ ८१-८४ ॥

ब्राह्मणः संभवेनैव देवानाम्पि दैवतम् ।
प्रमाणं चैव लोकस्य ब्रह्माचैव हि कारणम् ॥ ८५ ॥
तेषां वेदविदो ब्रूयुस्त्रयोऽप्येनः सुनिष्कृतिम् ।
सा तेषां पावना यस्मात्पवित्रा विदुषां हि वाक् ॥ ८६ ॥
अतोऽन्यतममास्थाय विधिं विप्रः समाहितः ।
ब्रह्महत्याकृतं पापं व्यपोहत्यात्मवत्तया ॥ ८७ ॥
हत्वा गर्भमविज्ञातमेतदेव व्रतं चरेत् ।
राजन्यवैश्यौ चेजानावत्रेयीमेव च स्त्रियम् ॥ ८८ ॥

ब्राह्मण जन्म से ही देवों का भी देव है, और उसका उपदेश
वेदमूलक होने से लोक में प्रमाण माना जाता है। वेदज्ञों में तीन
ब्राह्मण जो प्रायश्चित्त पाप का बतलावें, वह पापियों को पवित्र
करता है। क्योंकि, ब्राह्मणों की वाणीही पावन है। इस लिए
सावधान होकर कहे प्रायश्चित्तों में कोई भी करने से ब्राह्मण
पाप-मुक्त होजाता है। अज्ञान में गर्भहत्या, यज्ञ करते क्षत्रिय, वैश्य
और गर्भवती स्त्री का वध करके भी यही ब्रह्महत्या का प्रायश्चित्त
करना चाहिए ॥ ८५-८८ ॥

उक्त्वा चैवानृतं साक्ष्ये प्रतिरुध्य गुरुं तथा ।
अपहृत्य च निक्षेपं कृत्वा च स्त्रीसुहृद्वधम् ॥ ८६ ॥
इयं विशुद्धिरुदिता प्रमाप्याकामतौ द्विजम् ।
कामतो ब्राह्मणवधे निष्कृतिर्न विधीयते ॥ ६० ॥