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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

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Page 551

ग्यारहवां अध्याय । ४११
का निशान करे, या जलती आग में नीचा शिर करके तीनबार
कूदे । अथवा अश्वमेध, स्वर्गजित्, अभिजित्, गोसव, विश्वजित्,
त्रिवृत् और अग्निष्टुत् इन यज्ञों में कोईसा करे । अथवा मिता-
हारी जितेन्द्रिय होकर, किसी वेद का पाठ करता हुआ सौ योजन
तक चलाजाय । अथवा वेदज्ञ ब्राह्मण को अपना सर्वस्व या जी-
विका योग्य धन, वा सब सामग्री सहित घर देदेवे । अथवा हविष्य
भोजन करता हुआ सरस्वती नदी के सोते की तरफ़ गमन करे।
या नियमित भोजन करके तीनों वेद संहिताओं का पाठ करे।
या दाढ़ी, मूंछ मुड़ाकर, गांव के बाहर गौगोठ में, आश्रम में, या
वृक्ष के जड़ में रहकर, गो-ब्राह्मण के हितसाधन में लगा रहे ।
अथवा ब्राह्मण और गौ के निमित्त तुरंत प्राण त्याग देने से ब्रह्म-
हत्या से मुक्त होजाता है ॥ ७३-८० ॥
त्रिवारं प्रतिरोद्धा वा सर्वस्वमवजित्य वा ।
विप्रस्य तन्निमित्ते वा प्राणालाभे विमुच्यते ॥ ८१ ॥
एवं दृढव्रतो नित्यं ब्रह्मचारी समाहितः ।
समाप्ते द्वादशे वर्षे ब्रह्महत्यां व्यपोहति ॥ ८२ ॥
शिष्ट्वा वा भूमिदेवानां नरदेवसमागमे ।
स्वमेनोऽवभृथस्नातो हयमेधे विमुच्यते ॥ ८३ ॥
धर्मस्य ब्राह्मणो मूलमग्रं राजन्य उच्यते ।
तस्मात्समागमे तेषामेनो विख्याप्य शुध्यति ॥ ८४ ॥
कोई चोर ब्राह्मण का धन चुराकर लिये जाता हो तो उस पर
तीन बार चढ़ाई करके धन को लौटालावे या न लावे तो भी ब्रह्म-
हत्या से छूट जाता है। अथवा जब धन के लिए यह ब्राह्मण युद्ध
करके मरने को तैयार हो, तब उतना धन देकर उसका प्राण
बचाने से भी ब्रह्महत्या से छूटजाता है। इस प्रकार, ब्रह्मचर्य से
दृढ़तापूर्वक व्रत ठाननेवाला बारह वर्ष में ब्रह्महत्या से छूटजाता