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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

Page 456 of 649

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Page 456

३१६ : मनुस्मृति।
न स्वामिना निसृष्टोपि शूद्रो दास्याद्विमुच्यते ।
निसर्गजं हि तत्तस्य कस्तस्मात्तदपोहति ॥ ४१४ ॥
राजा वैश्यों से व्यापार, ब्याज, खेती और पशुरक्षा का उद्यम
करावे। और शूद्रों से द्विजोंकी सेवा करावे। जीविका से रहित
क्षत्रिय और वैश्यों से ब्राह्मण अपना कर्म करावे और उनका पा-
लन करे। यदि धनी ब्राह्मण लोभवश उत्तम द्विजों से सेवाकर्म
करावे तो उसपर राजा छ सौ पण दण्ड करे । खरीदे वा बिना
खरीदे शूद्रों से सेवाही करावे क्योंकि ब्रह्मा ने शूद्रों को दासकर्म
के लिए ही पैदा किया है। स्वामी से छुड़ाया हुआ भी शूद्र दास-
कर्म को नहीं छोड़ सकता क्योंकि वह उसका स्वाभाविक धर्म
है ॥ ४१०-४१४ ॥
ध्वजाहृतो भक्तदासो गृहजः क्रीतदत्रिमौ ।
पौत्रिको दण्डदासश्च सप्तैते दासयोनयः ॥ ४१५ ॥
भार्या पुत्रश्च दासश्च त्रय एवाधनाः स्मृताः ।
यत्ते समधिगच्छन्ति यस्य ते तस्य तद्धनम् ॥ ४१६ ॥
विश्रब्धं ब्राह्मणः शूद्राद् द्रव्योपादानमाचरेत् ।
न हि तस्यास्ति किञ्चित्स्वं भर्तृहार्यधनो हि सः॥४१७॥
युद्ध में जीतकर लाया हुआ, भक्त दास, दासीपुत्र, खरीदा
हुआ, किसी का दिया हुआ, परंपरा से प्राप्त और दण्ड-शुद्धि के
लिए जिसने दासपना किया हो; ये सात प्रकार के दास होते हैं।
भार्या, पुत्र और दास इन तीनों को मनुने निर्धन कहा है, ये जो
धन पाते हैं, वह उसका है जिसके ये होते हैं। ब्राह्मण को अपने
दास शूद्र से बिना विचार धन ले लेना चाहिए उसका धन कुछ
नहीं है क्योंकि दास के धन का मालिक उसका मालिक ही
है ॥ ४१५-४१७ ॥
वैश्यशूद्रौ प्रयत्नेन स्वानि कर्माणि कारयेत् ।