मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in contextआठवा अध्याय। ३०५
देरी न करे। कुवाच्य कहनेवाले, चोर और मार-पीट करने
वालों की अपेक्षा लुटेरों को अधिक अपराधी जानना चाहिए।
जो राजा लुटेरों को क्षमा करता है वह शीघ्रही नष्ट होकर प्रजा
का वैरी होजाता है। राजा, किसी मित्र के कहने से वा धन मिलने
से भयदायी लुटेरों को कभी न छोड़े ॥ ३४३-३४७ ॥
शस्त्रं द्विजातिभिर्ग्राह्यं धर्मो यत्रोपरुध्यते ।
द्विजातीनां च वर्णानां विप्लवे कालकारिते ॥ ३४८ ॥
आत्मनश्च परित्राणे दक्षिणानां च संगरे ।
स्त्रीविप्राभ्युपपत्तौ च घ्नन् धर्मेण न दुष्यति ॥ ३४६ ॥
गुरुं वा बालवृद्धौ वा ब्राह्मणं वा बहुश्रुतम् ।
आततायिनमायान्तं हन्यादेवाविचारयन् ॥ ३५० ॥
जिस समय यज्ञादि धर्म-कर्म रोका जाता हो, वर्णाश्रम-धर्म
का नाश होता हो, उस समय द्विजोंको अस्त्र ग्रहण करना चाहिए।
अपनी रक्षा करने में, दक्षिणा की रक्षा में, स्त्री और ब्राह्मणों की
विपत्ति में धर्म युद्ध से मारनेवाला पापभागी नहीं, होता । गुरु,
बालक, बूढ़ा वेदज्ञ ब्राह्मण भी आततायीपन से मारने आवें तो
बिना विचार उनके ऊपर प्रहार करे ॥ ३४८-३५० ॥
नाततायिवधे दोषो हन्तुर्भवति कश्चन ।
प्रकाशं वाऽप्रकाशं वा मन्युस्तं मन्युमृच्छति ॥ ३५१ ॥
परदाराभिमर्शेषु प्रवृत्तान्नॄन्महीपतिः ।
उद्वेजनकरैर्दण्डैश्चिह्नयित्वा प्रवासयेत् ॥ ३५२ ॥
तत्समुत्थो हि लोकस्य जायते वर्णसंकरः ।
येन मूलहरो धर्मः सर्वनाशाय कल्प्यते ॥ ३५३ ॥
परस्य पत्न्या पुरुषः संभाषां योजयन् रहः ।
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