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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

Page 444 of 649

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Page 444

३०४ मनुस्मृति।
असंधितानां संधाता संधितानां च मोक्षकः ।
दासाश्वरथहर्ता च प्राप्तः स्याच्चौरकिल्विषम् ॥ ३४२॥
बिना बांड़ा के खेतों से फल, मूल, अग्निहोत्र के लिए काष्ठ,
गौओं के लिए घास कोई लेवे तो वह चोरी नहीं कहाती—मनुजी
कहते हैं। जो ब्राह्मण परधन हरण करनेवाले को यज्ञ कराकर या
शास्त्र पढ़ाकर उससे धन लेना चाहता है, वह ब्राह्मण भी चोर
के समान ही है। जीविकाहीन द्विज मार्ग में जाता हुआ किसी
के खेत से दो ऊख या दो मूली ले लेय तो दण्ड योग्य नहीं है।
दूसरे के खुले पशुओं को बाँधनेवाला और बंधों को खोलनेवाला,
दास, घोड़ा, और रथ को हरनेवाला चोरी का अपराधी
होता है ॥ ३३६-३४२ ॥
अनेन विधिना राजा कुर्वाणःस्तेननिग्रहम् ।
यशोस्मिन् प्राप्नुयाल्लोके प्रेत्य चानुत्तमं सुखम् ॥ ३४३ ॥
ऐन्द्रं स्थानमभिप्रेप्सुर्यशश्चाक्षयमव्ययम् ।
नोपेक्षेत क्षणमपि राजा साहसिकं नरम् ॥ ३४४ ॥
वाग्दुष्टात्तस्कराच्चैव दण्डेनैव च हिंसतः ।
साहसस्य नरः कर्ता विज्ञेयः पापकृत्तमः ॥ ३४५ ॥
साहसे वर्तमानं तु यो मर्षयति पार्थिवः ।
स विनाशं व्रजत्याशु विद्वेषं चाधिगच्छति ॥ ३४६ ॥
न मित्रकारणाद्राजा विपुलाद्वा धनागमात् ।
समुत्सृजेत साहसिकान् सर्वभूतभयावहान् ॥ ३४७ ॥
इस प्रकार उक्त विधि से चोरों का निग्रह करने से राजा इस
लोक में सुयश और अन्त में अक्षय सुख पाता है। इन्द्रासन और
सुयश चाहनेवाला राजा लुटेरे मनुष्यों के निग्रह में क्षणमात्र भी