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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

Page 404 of 649

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Page 404

२६४ मनुस्मृति ।
तत्र वक्तव्यमनृतं तद्धि सत्याद्विशिष्यते ॥ १०४ ॥
वाग्दैवत्यैश्च चरुभिर्यजेरंस्ते सरस्वतीम् ।
अनृतस्यैनसस्तस्य कुर्वाणा निष्कृतिं पराम् ॥ १०५ ॥
कूष्माण्डैर्वापि जुहुयाद्घृतमग्नौ यथाविधि ।
उदित्यूचा वा वारुण्या ऋचेनाब्दैवतेन वा ॥ १०६ ॥
त्रिपक्षादब्रुवन् साक्ष्यमृणादिषु नरोऽगदः ।
तदृणं प्राप्नुयात्सर्वं दशबन्धं च सर्वतः ॥ १०७ ॥
यस्य दृश्येत सप्ताहादुक्तवाक्यस्य साक्षिणः ।
रोगोऽग्निर्ज्ञातिमरणमृणं दाप्यो दमं च सः ॥ १०८ ॥
असाक्षिकेेषु त्वर्थेषु मिथो विवदमानयोः ।
अविन्दंस्तत्त्वतः सत्यं शपथेनापि लम्भयेत् ॥ १०९ ॥
महर्षिभिश्च देवैश्च कार्यार्थं शपथाः कृताः ।
वशिष्ठश्चापि शपथं शेपे पैजवने नृपे ॥ ११० ॥
जो मनुष्य जानता हुआ भी धर्मवश झूठ बोले तो वह स्वर्गलोकसे
पतित नहीं होता क्योंकि उस असत्य को देववाणी कहते हैं। जिस
मामला में शूद्र, वैश्य, क्षत्रिय और ब्राह्मणों के प्राण जाते हों वहां
साक्षी झूठ बोले-वह झूठ भी सत्य से श्रेष्ठ है । झूठे गवाहों
को उस पाप से छुटकारा पानेके लिए वाणी देवता के लिए चरु
बनाकर सरस्वतीदेवी का पूजन करना चाहिए । अथवा कूष्माण्ड
मन्त्रों ( यद्देवा देवहेडनम् यजु० २० । १४ ) से हवन करे । या
वरुण देवता के (उदुत्तमं वरुणपाशम्' यजु० १२। १२) मन्त्रसे अथवा
जल देवता के मन्त्र ( आपो हिष्ठा यजु० ११ । ५० ) से हवन करे।
कर्ज़ाके बारेमें साक्षी नीरोग होनेपर तीनदिनतक न आवे तो महा-
जन अपना सब ऋण पावे और धन का दशांश गवाहपर दण्ड