मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context[आठवां अध्याय । २६३
अप्सु भूमिवदित्याहुः स्त्रीणां भोगे च मैथुने ।
अब्जेषु चैव रत्नेषु सर्वेष्वश्ममयेषु च ॥ १०० ॥
जो सभा में बिना देखी बात बनाकर बोलता है वह अंधा होकर
कांटों सहित मछली खाता है। साक्षी के समय जिसकी जीवात्मा
असत्य की शङ्का नहीं करता, उससे अच्छा देवगण दूसरे को
नहीं मानते। हे सौम्य ! जिस साक्षी में झूठ बोलनेवाला जितने
बान्धवों के मारने का फल पाता है वह यों है--पशु के बारे में झूठ
बोलने से पांच बान्धवों की हत्या का पातक होता है। गौके विषय
में दश, घोड़ा के सौ और पुरुष के लिए हज़ार की हत्या का पातक
लगता है। सुवर्ण के लिए बोलने से पैदा हुए या होनेवालों की
हत्या को पाता है और भूमि के लिए कहने से संपूर्ण प्राणियों के
वध को करता है। इसलिए भूमि के बारे में कभी झूठी साक्षी न
दे। सरोवर के जल, स्त्रीसंभोग, जल से पैदा मोती और नीलम
आदि रत्नों के लिए झूठी गवाही देने से भूमि का सा दोष
होता है ॥ ९५-१०० ॥
एतान् दोषानवेक्ष्य त्वं सर्वाननृतभाषणे ।
यथाश्रुतं यदादृष्टं सर्वमेवाञ्जसा वद ॥ १०१ ॥
गोरक्षकान् वाणिजिकांस्तथा कारुकुशीलवान् ।
प्रेष्यान् वार्धुषिकांश्चैव विप्रान् शूद्रवदाचरेत् ॥१०२॥
इन सब पातकों को समझकर, जैसा देखा या सुना है वही ठीक
ठीक कहो। गोपालक, बनियां, बढ़ई, लोहार, गानेबजाने का काम
करनेवाले, नौकरी पेशा और व्याजखोर ब्राह्मणों से गवाही लेते
समय शूद्र के समान प्रश्न-सवाल करे ॥ १०१-१०२ ॥
तद्वदन् धर्मतोऽर्थेषु जानन्नप्यन्यथा नरः ।
न स्वर्गाच्च्यवते लोकाद्दैवीं वाचं वदन्ति ताम् ॥ १०३॥
शूद्रविट्क्षत्रविप्राणां यत्रार्तोक्तौ भवेद्वधः ।