मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context१६४ मनुस्मृति ।
विना जाने कोई अभक्ष्य पदार्थ खालेय तो उसकी शुद्धि के
लिए ब्राह्मण को एक वर्ष में एक कृच्छ्रव्रत अवश्य करना चाहिए।
और जानकर खालिया हो तो विशेष प्रायश्चित्त करना उचित है।
आपत्ति, दुर्भिक्ष के समय में अपने कर्म की पूर्णता के लिए
ब्राह्मणों को उत्तम मृग—पक्षियों का वध करना चाहिए। या
जिनका पालन भार अपने ऊपर हो उनकी तृप्ति के लिए मृग-
पक्षियों को मारना चाहिए क्योंकि पूर्व समय में अगस्त्य मुनि ने
ऐसा काम किया था ॥ २१-२२ ॥
बभूवुर्हि पुरोडाशा भक्ष्याणां मृगपक्षिणाम् ।
पुराणेष्वपि यज्ञेषु ब्रह्मक्षत्रसवेषु च ॥ २३ ॥
यत्किञ्चित्स्नेहसंयुक्तं भक्ष्यं भोज्यमगर्हितम् ।
तत्पर्युषितमप्याद्यं हविःशेषं च यद्भवेत् ॥ २४ ॥
चिरस्थितमपि त्वाद्यमस्नेहाक्तं द्विजातिभिः ।
यवगोधूमजं सर्वं पयसश्चैव विक्रियाः ॥ २५ ॥
एतदुक्तं द्विजातीनां भक्ष्याभक्ष्यमशेषतः ।
मांसस्यातः प्रवक्ष्यामि विधिं भक्षणवर्जने ॥ २६ ॥
प्राचीन काल में ऋषि, ब्राह्मण और क्षत्रियों के यज्ञ में भक्ष्य
मृग पक्षियों के पुरोडाश हुआ करते थे। जो भक्ष्य, भोज्य पदार्थ
निन्दित नहीं हैं, वे बासी होने पर भी घी आदि मिला हो तो खाने
लायक हैं और जो हवन शेष है वह भी खाने योग्य होता है। जौ,
गेहूं के पदार्थ, दूध के पदार्थ अधिक दिन के बने हों पर घी से तर
न हों तो उनको भी न खाना चाहिए। इस प्रकार द्विजों के भक्ष्य
और अभक्ष्य सब पदार्थ कहे गये हैं अब मांसभक्षण और उसके
त्याग की विधि कहते हैं ॥ २३-२६ ॥
प्रोक्षितं भक्षयेन्मांसं ब्राह्मणानां च काम्यया ।
यथाविधि नियुक्तस्तु प्राणानामेव चात्यये ॥ २७ ॥