मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
Page 303 of 649
Read in contextपाँचवां अध्याय । १६३
राजीवान् सिंहतुण्डांश्च सशल्कांश्चैव सर्वशः ॥१६॥
न भक्षयेदेकचरानज्ञातांश्च मृगद्विजान् ।
भक्ष्येष्वपि समुद्दिष्टान्सर्वान्पञ्चनखांस्तथा ॥ १७॥
श्वाविधं शल्यकं गोधां खड्गकूर्मशशांस्तथा ।
भक्ष्यान्पञ्चनखेष्वाहुरनुष्ट्रांश्चैकतोदतः ॥ १८ ॥
छत्राकं विड्वराहं च लशुनं ग्रामकुक्कुटम् ।
पलाण्डुं गृञ्जनं चैव मत्या जग्ध्वा पतेद्विजः ॥ १९ ॥
अमत्यैतानि षड् जग्ध्वा कृच्छ्रं सान्तपनं चरेत् ।
यतिचान्द्रायणं वापि शेषेषूपवसेदहः ॥ २० ॥
पढ़न, रोहू आदि सब मछलियां हव्य-कव्य में ग्रहण के लायक
होती हैं। राजीव सिंहतुण्ड और मोटी खाल की मछली भी ग्राह्य
हैं। अकेले घूमनेवाले और अनजान पक्षी, मृग अभक्ष्य हैं और जो
भक्ष्य पांच नखवाले पशु हैं उनमें भी सब भक्ष्य नहीं हैं । साही,
शल्यक, गोधा, गैंडा, कछुआ, खरगोश ये पांच नखवालों में भक्ष्य
हैं। और ऊंट को छोड़ कर, एक दांतवाले दूसरे पांच नखवाले भी
भक्ष्य हैं। धरती का फूल, गांव का सुअर, लहसुन, गांव का मुरगा,
शलगम, प्याज़ इनको जानकर खानेवाला द्विज पतित होजाता
है। और ये छ पदार्थ अनजान में खालेय तो सान्तपननामक वा
यतिचान्द्रायणनामक प्रायश्चित्त करे । और लाल गोंद आदि खा-
लेय तो एक दिन उपवास करे ॥ १६-२० ॥
संवत्सरस्यैकमपि चरेत्कृच्छ्रं द्विजोत्तमः ।
अज्ञातभुक्तशुद्ध्यर्थं ज्ञातस्य तु विशेषतः ॥ २१ ॥
यज्ञार्थं ब्राह्मणैर्वध्याः प्रशस्ता मृगपक्षिणः ।
भृत्यानां चैव वृत्त्यर्थमगस्त्यो ह्यचरत्पुरा ॥ २२ ॥