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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

Page 298 of 649

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Page 298

१५८ मनुस्मृति ।
माता, पिता, गुरु न वर्तमान हों या उनसे जुदा रहता हो तो ब्राह्मण
अपनी जीविका के लिए सत्पुरुषों से दान ले लेवे ॥ २५०-२५२ ॥
आर्धिकः कुलमित्रं च गोपालो दासनापितौ ।
एते शूद्रेषु भोज्यान्ना यश्चात्मानं निवेदयेत् ॥ २५३॥
यादृशोऽस्य भवेदात्मा यादृशश्च चिकीर्षितम् ।
यथा चोपचरेदेनं तथात्मानं निवेदयेत् ॥ २५४ ॥
योऽन्यथासन्तमात्मानमन्यथा सत्सु भाषते ।
स पापकृत्तमो लोके स्तेन आत्मापहारकः ॥ २५५ ॥
वाच्यर्था नियताः सर्वे वाङ्मूला वाग्विनिःसृताः ।
तां तु यःस्तेनयेद्वाचं स सर्वस्तेयकृन्नरः ॥ २५६ ॥
अपना साथी, कुलपरम्परा का मित्र, अहीर, दास, नापित और
अपने को अर्पण करनेवाले शूद्र का अन्न ग्रहण करना चाहिए ।
आत्मसमर्पण करनेवाला अपना कुल, देश, जो काम करके पास
रहना चाहे और जैसे सेवा करना चाहे-सब निवेदन करे । जो
अपनी असलियत छिपाकर सज्जनों के सामने दूसरे ढंग का बनता
है वह महापापी, चोर, अपने को छिपानेवाला माना जाता है,
सब अर्थ वाणी में रहते हैं, उनका मूल भी वाणी ही है और वाणी
में से निकले हैं, ऐसी वाणी को जो चुराता है अर्थात् झूठ बोलता
है वह सब वस्तुओं की चोरी करता है ॥ २५३-२५६ ॥
महर्षिपितृदेवानां गत्वानृण्यं यथाविधि ।
पुत्रे सर्वं समासज्य वसेन्माध्यस्थ्यमाश्रितः ॥ २५७॥
एकाकी चिन्तयेन्नित्यं विविक्ते हितमात्मनः ।
एकाकी चिन्तयानो हि परं श्रेयोऽधिगच्छति ॥ २५८ ॥
एषोदिता गृहस्थस्य वृत्तिर्विप्रस्य शाश्वती ।