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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

Page 297 of 649

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Page 297

चौथा अध्याय । १५७
सर्वतः प्रतिगृह्णीयान्मध्वथामयदक्षिणाम् ॥ २४७ ॥
आहृतामभ्युद्यतां भिक्षां पुरस्तादप्रचोदिताम् ।
मेने प्रजापतिर्ग्राह्यामपि दुष्कृतकर्मणः ॥ २४८ ॥
नाश्नन्ति पितरस्तस्य दश वर्षाणि पञ्च च ।
न च हव्यं वहत्यग्निर्यस्तामभ्यवमन्यते ॥ २४६ ॥
अच्छे पुरुषों के साथ सम्बन्ध करना और नीचों से सम्बन्ध
छोड़ता हुआ पुरुष श्रेष्ठता पाता है, नहीं तो शूद्र के समान होजाता
है। कर्तव्यमें अचल, कोमल स्वभाव, इन्द्रियोंको वश रखकर, दुराचार
से बचकर, हिंसा न करके पुरुष स्वर्ग को जीत लेता है। समिधा,
जल, कन्द, फल, पक्वान्न, कच्चा अन्न, मधु और अभयदान इन
पदार्थों में कोई भी वस्तु विना मांगे आजाय तो उसको स्वीकार
करलेना चाहिए। विना प्रेरणा के यदि दुराचारी भी भिक्षा ले आवे
तो उसे ग्रहण करलेना चाहिए यह प्रजापति की आज्ञा है। जो उस
भिक्षा का अपमान करता है, उसके पितर पन्द्रह वर्ष तक उसकी
श्राद्ध नहीं लेते और अग्नि हव्य नहीं ग्रहण करता ॥ २४५-२४६ ॥
शय्यागृहान्कुशान्गन्धानपः पुष्पं मणीन्दधि ।
धाना मत्स्यान्पयो मांसं शाकं चैव न निर्णुदेत् ॥ २५० ॥
गुरून् भृत्यांश्चोज्जिहीर्षन्नर्चिष्यन् देवतातिथीन् ।
सर्वतःप्रतिगृह्णीयान्न तु तृप्येत् स्वयं ततः ॥ २५१ ॥
गुरुषु त्वभ्यतीतेषु विना वातैर्गृहे वसन् ।
आत्मनो वृत्तिमन्विच्छन् गृह्णीयात्साधुतः सदा ॥ २५२॥
पलँग, घर, कुश, सुगंध की चीज़, जल, फूल, मणि, दही, भुना
अन्न, मछली, दूध, मांस और शाक यह कोई देने आवे तो लौटाना
न चाहिए। अतिथि देवता गुरु आदि के सत्कार की सामग्री न
होय तो उसे मांग भी लेवे, पर अपने काम में न लगाना चाहिए।