मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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चौथा अध्याय । १३१
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या एक दिन रातही अनध्याय रखना चाहिए। फिर, नियम से
शुक्लपक्ष में वेदों का अध्ययन और कृष्णपक्ष में वेद के अङ्गों का
अध्ययन करना चाहिए ॥ ९५-९८ ॥
नाविस्पष्टमधीयीत न शूद्रजनसन्निधौ ।
न निशान्ते परिश्रान्तो ब्रह्माधीत्य पुनः स्वपेत् ॥ ९९ ॥
यथोदितेन विधिना नित्यं छन्दस्कृतं पठेत् ।
ब्रह्म छन्दस्कृतं चैव द्विजो युक्तो ह्यनापदि ॥ १०० ॥
इमान्नित्यमनध्यायानधीयानो विवर्जयेत् ।
अध्यापनं च कुर्वाणः शिष्याणां विधिपूर्वकम् ॥ १०१ ॥
कर्णश्रावेऽनिले रात्रौ दिवा पांसुसमूहने ।
एतौ वर्षास्वनध्यायावध्यायज्ञाः प्रचक्षते ॥ १०२ ॥
विद्युत्स्तनितवर्षेषु महोल्कानां च संप्लवे ।
आकालिकमनध्यायमेतेषु मनुरब्रवीत् ॥ १०३ ॥
अनध्याय और वेदपाठ-नियम ।
वेदपाठ साफ़ करना। शूद्र के पास में न करना। पिछली रात
में वेदाध्ययन से थककर, फिर न सोना चाहिए। इस प्रकार नित्य
मन्त्र भाग का अध्ययन करना, या होसके तो मन्त्र और ब्राह्मण
दोनों भागका अध्ययन करना। वेदाध्ययन और शिष्योंको अध्यापन
करानेवालों को अनध्यायों में वेदपाठ न करना चाहिए। रात में
वायु की सनसनाहट कान में सुन पड़े और दिन में धूल की वर्षा
हो तब वर्षाकाल में अनध्याय करना। बिजली की चमक, मेघ
की गरज और जलवर्षा, बड़ा उल्कापात यह जबतक हो तबतक
अनध्याय रखना। यह मनुजी की आज्ञा है ॥ ९९-१०३ ॥
एतांस्त्वभ्युदितान्विद्याद्यदा प्रादुष्कृताग्निषु ।
तदा विद्यादनध्यायमनृतौ चाभ्रदर्शने ॥ १०४ ॥