Skip to content
SarvaKosh
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

Page 270 of 649

Read in context
Page 270

१३० । मनुस्मृति ।
पूर्वा सन्ध्यां जपंस्तिष्ठेत् स्वकाले चापरां चिरम् ॥ ९३॥
ऋषयो दीर्घसन्ध्यात्वाद्दीर्घमायुरवाप्नुयुः ।
प्रज्ञां यशश्च कीर्तिं च ब्रह्मवर्चसमेव च ॥ ९४ ॥
इस प्रकार जो सब विषय जानते हैं वे वेदज्ञ-विद्वान्-ब्राह्मण
परलोक में सुख पाने की इच्छा से राजा का दान नहीं लेते हैं ।
ब्राह्ममुहूर्त्त-दो घड़ी सवेरे उठकर अपना धर्म और अर्थ का और
उसके लिए आवश्यक शरीर श्रम का विचार करना । वेदचिन्तन
और परमात्मा का स्मरण करना । प्रातःकाल उठकर शौच आदि
से निवृत्त होकर स्नान और सन्ध्या करके गायत्रीजप करना।
और सायंकाल को भी नक्षत्र दर्शन तक सन्ध्या-गायत्री का
अनुष्ठान करना । ऋषियों ने चिरकाल तक सन्ध्या, गायत्री
की उपासना से दीर्घायु, बुद्धि, यश, कीर्ति और ब्रह्मतेज को
पाया था ॥ ९१-९४ ॥
श्रावण्यां प्रौष्ठपद्यां वाप्युपाकृत्य यथाविधि ।
युक्तश्छन्दांस्यधीयीत मासान् विप्रोऽर्धपञ्चमान् ॥९५॥
पुष्ये तु छन्दसां कुर्याद्बहिरुत्सर्जनं द्विजः ।
माघशुक्लस्य वा प्राप्ते पूर्वाह्णे प्रथमेऽहनि ॥ ९६ ॥
यथाशास्त्रं तु कृत्वैवमुत्सर्गं छन्दसां बहिः ।
विरमेत् पक्षिणीं रात्रिं तदैवैकमहर्निशम् ॥ ९७ ॥
अत ऊर्ध्वं तु छन्दांसि शुक्लेषु नियतः पठेत् ।
वेदाङ्गानि च सर्वाणि कृष्णपक्षेषु संपठेत् ॥ ९८ ॥
श्रावण की पूर्णी या भाद्र की पूर्णी को विधि से उपाकर्म करके,
ब्राह्मण साढ़े चार महीने तक नियम से वेदाध्ययन करे। फिर
पौष की पूर्णी को या माघ की प्रतिपदा को नगर के बाहर जाकर, पूर्वाह्न
में वेद का उत्सर्ग करना । उसके बाद दो दिन और बिचली रात,