मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
Page 233 of 649
Read in contextतीसरा अध्याय । ६३
जीविका करनेवाला जोशी, पक्षी पालनेवाला, युद्धशिक्षा देने
वाला, नहर आदि तोड़नेवाला, उसको बंद करनेवाला, घर
बनानेवाला, दूत, मज़दूरी लेकर वृक्ष लगानेवाला, खेल के लिए
कुत्ता पालनेवाला, बाज पक्षी से जीविका करनेवाला, कन्या को
दूषित करनेवाला, हिंसक, शूद्र आचरण करनेवाला, और भूत,
पिशाच पुजानेवाला ये सब कर्म करनेवाले ब्राह्मण श्राद्ध में
भोजन न पावें ॥ १६२-१६४ ॥
आचारहीनः क्लीबश्च नित्यं याचनकस्तथा ।
कृषिजीवी श्लीपदी च सद्भिर्निन्दित एव च ॥ १६५ ॥
औरभ्रिको माहिषिकः परपूर्वापतिस्तथा ।
प्रेतनिर्यातकश्चैव वर्जनीयाः प्रयत्नतः ॥ १६६ ॥
एतान् विगर्हिताचारानपांक्तेयान् द्विजाधमान् ।
द्विजातिप्रवरो विद्वानुभयत्र विवर्जयेत् ॥ १६७ ॥
आचाररहित, नपुंसक, रोज़ भीख मांगनेवाला, खेती से जीने
वाला, पीलपांव रोगवाला, सत्पुरुषों से निन्दित, मेंड़ा और भैंस
से जीनेवाला, जो दूसरे की होचुकी हो उसके साथ विवाह
करनेवाला और प्रेत का धन लेनेवाला इनको श्राद्ध में वर्जित
करना चाहिए । इन सब दूषित आचारवाले और पंक्तिबाह्य
अधम ब्राह्मणों को देव और पितृकार्य में विद्वान् पुरुष त्याग
देवे ॥ १६५-१६७ ॥
ब्राह्मणस्त्वनधीयानस्तृणाग्निरिव शाम्यति ।
तस्मै हव्यं न दातव्यं न हि भस्मनि हूयते ॥ १६८ ॥
अपांक्तदाने यो दातुर्भवत्यूर्ध्वं फलोदयः ।
दैवे हविषि पित्र्ये वा तत्प्रवक्ष्याम्यशेषतः ॥ १६६ ॥
अव्रतैैर्यद्द्विजैर्भुक्तं परिवेत्रादिभिस्तथा ।