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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

Page 232 of 649

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Page 232

६२ मनुस्मृति ।
समुद्रयायी वन्दी च तैलिकः कूटकारकः ॥ १५८ ॥
पित्रा विवदमानश्च कितवो मद्यपस्तथा ।
पापरोग्यभिशस्तश्च दाम्भिको रसविक्रयी ॥ १५६ ॥
धनुःशराणां कर्ता च यश्चाग्रे दिधिषूपतिः ।
मित्रध्रुक् द्यूतवृत्तिश्च पुत्राचार्यस्तथैव च ॥ १६० ॥
भ्रामरी गण्डमाली च श्वित्र्यथो पिशुनस्तथा ।
उन्मत्तोऽन्धश्च वर्ज्याः स्युर्वेदनिन्दक एव च ॥ १६१ ॥
घर में आग लगानेवाला, ज़हर देनेवाला, जार से पैदा हुए
का अन्न खानेवाला, सोमलता बेचनेवाला, समुद्र पार जानेवाला,
राजा की स्तुति करनेवाला, तेल का व्यापारी, झूठी गवाही देने
वाला, पिता से लड़नेवाला, धूर्त, शराबखोर, कोढ़ी आदि पाप-
रोगी, निन्दित, पाखण्डी, दूध, दही बेचनेवाला, धनुष् और बाण
बनानेवाला, जो बड़ी बहिन के क्वारी रहते छोटी का पति बन
गया हो, मित्रद्रोही, जुवा से जीविका करनेवाला, अपने पुत्र से
विद्या पढ़नेवाला, मृगीरोगी, गण्डमालारोगी, श्वेतकुष्ठ, चुगल-
खोर, पागल, अन्धा, वेदनिन्दक इतने प्रकार के ब्राह्मण श्राद्ध में
वर्जित हैं ॥ १५८-१६१ ॥
हस्तिगोश्वोष्ट्रदमको नक्षत्रैर्यश्च जीवति ।
पक्षिणां पोषको यश्च युद्धाचार्यस्तथैव च ॥ १६२ ॥
स्रोतसां भेदको यश्च तेषां चावरणे रतः ।
गृहसंवेशको दूतो वृक्षारोपक एव च ॥ १६३ ॥
श्वक्रीडी श्येनजीवी च कन्यादूषक एव च ।
हिंस्रो वृषलवृत्तिश्च गणानां चैव याजकः ॥ १६४ ॥
हाथी, बैल, घोड़ा और ऊँटों का सिखानेवाला, नक्षत्र से