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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

Page 198 of 649

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Page 198

५८ । मनुस्मृति ।
प्रतिवातेऽनुवाते च नासीत गुरुणा सह ।
असंश्चवे चैव गुरोर्न किंचिदपि कीर्तयेत् ॥ २०३ ॥
शिष्य खुद दूर रहकर, दूसरे के द्वारा गुरुपूजा न करे। पूजा
में क्रोध न करे, गुरु अपनी स्त्री के पास हों तब पूजा न करे ।
अगर आसन या गाड़ी में बैठा हो तो उतर कर गुरु को प्रणाम
करे। गुरु के तरफ, शिष्य के तरफ से वायु लगता हो या शिष्य
के गुरु के तरफ से वायु लगता हो तो शिष्य गुरुसम्मुख में न
बैठे। और गुरु.न सुन सकें तो कुछ न कहना चाहिए ॥ २०२-२०३॥
गोऽश्वोष्ट्रयानप्रासादप्रस्तरेषु कटेषु च ।
आसीत गुरुणा सार्धं शिलाफलकनौषु च ॥ २०४ ॥
गुरोर्गुरौ सन्निहिते गुरुवद्वृत्तिमाचरेत् ।
न चानिसृष्टो गुरुणा स्वान्गुरूनाभिवादयेत् ॥ २०५ ॥
विद्यागुरुष्वेतदेव नित्या वृत्तिः स्वयोनिषु ।
प्रतिषेधत्सु चाधर्मान् हितं चोपदिशत्स्वपि ॥ २०६ ॥
श्रेयःसु गुरुवद्वृत्तिं नित्यमेव समाचरेत् ।
गुरुपुत्रेषु चार्येषु गुरोश्चैव स्वबन्धुषु ॥ २०७ ॥
बालः समानजन्मा वा शिष्यो वा यज्ञकर्मणि ।
अध्यापयन् गुरुसुतो गुरुवन्मानमर्हति ॥ २०८ ॥
बैल, घोड़ा, ऊंट की सवारी में, मकान की छत, चटाई, शिला.
पाटा और नाव पर गुरु के साथ बैठने का निषेध नहीं है। गुरु
का गुरु समीप आवे तो गुरु के माफिक बर्ताव करे । गुरु की
आज्ञा बिना अपने माता, पिता आदि को भी प्रणाम न करे ।
विद्या गुरु पिता आदि, अधर्म से बचानेवाला और हितैषी इन
से गुरु समान बर्ताव करे। विद्या, तप से श्रेष्ठ, अपने से बड़ा
सदाचारी, गुरुपुत्र और गुरुसम्बन्धी इनसे भी गुरु के समान
व्यवहार करे। गुरुपुत्र, अपने से छोटा, या समान अवस्था का