Skip to content
SarvaKosh
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

Page 197 of 649

Read in context
Page 197

दूसरा अध्याय । ५७
आसीनस्य स्थितः कुर्यादभिगच्छंस्तु तिष्ठतः ।
प्रत्युद्गम्य त्वाव्रजतः पश्चाद्धावंस्तु धावतः ॥ १९६ ॥
पराङ्मुखस्याभिमुखो दूरस्थस्यैत्य चान्तिकम् ।
प्रणम्य तु शयानस्य निदेशे चैव तिष्ठतः ॥ १९७ ॥
नीचं शय्यासनं चास्य सर्वदा गुरुसन्निधौ ।
गुरोस्तु चक्षुर्विषये न यथेष्टासनो भवेत् ॥ १९८ ॥
नोदाहरेदस्य नाम परोक्षमपि केवलम् ।
न चैवास्यानुकुर्वीत गतिभाषितचेष्टितम् ॥ १९६ ॥
गुरोर्यत्र परीवादो निन्दा वापि प्रवर्तते ।
कर्णौ तत्र पिधातव्यौ गन्तव्यं वा ततोऽन्यतः ॥२००॥
परीवादात्खरो भवति श्वा वै भवति निन्दकः ।
परिभोक्ता कृमिर्भवति कीटो भवति मत्सरी ॥ २०१ ॥
गुरु आसन पर बैठे हों तो शिष्य आसन से उठकर, गुरु खड़े
हों तो पास जाकर, आते हों तो सन्मुख जाकर और जा रहे हों
तो उनके पीछे दौड़कर बात करना चाहिए । गुरु पीछे हों तो
सन्मुख होकर, दूर हों तो पास जाकर, लेटे हों तो प्रणाम करके,
खड़े हों तो समीप होकर आज्ञा को सुनना चाहिए । गुरु के पास
में बिछौना वा आसन गुरु से नीचा रखना चाहिए और उनके
सामने मनमानी तौर से न बैठे । गुरु के पीछे भी उनका अकेला
नाम लेकर न बोले और उनकी चाल, बोल, चेष्टाकी नक़ल न करे ।
जहाँ गुरुनिन्दा होती हो वहाँ शिष्य अपने दोनों कानों को बंद
करलेवे या वहां से अलग चला जाय । गुरुनिन्दा सच्ची या झूठी
करने से, मर कर गधा और कुत्ता होता है । गुरुधन भोगनेवाला
कृमि और कुचाल करनेवाला कीट होता है ॥ १९६—२०१ ॥
दूरस्थो नार्चयेदेनं न क्रुद्धो नान्तिके स्त्रियाः ।
यानासनस्थश्चैवैनमवरुह्याभिवादयेत् ॥ २०२ ॥