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मनहिं निरंजन सबै नचाए

मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

by सतगुरु मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

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Devanagarihipublished120 pages

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में थे तो स्वप्न की सब चीजों को सच मान रहे थे, पर जागने पर सब समाप्त। इसी तरह जाग्रत अवस्था में प्राप्त होने वाली चीजें भी धोखा है। इस अवस्था में मूर्खता समायी है। हम कई बार ऐसे मूर्खमय कार्य कर डालते हैं कि बाद में पछताना पड़ता है। हम कहते हैं—यह क्या किया! अच्छा नहीं किया, ठीक नहीं किया। यदि सपना हमसे 4-5 घण्टे का सम्बन्ध रख रहा था तो यह सपना हमसे 70-80 साल तक का सम्बन्ध रख रहा है। इस अवस्था में माँ सच लग रही है, बाप सच लग रहा है, भाई सच लग रहा है, बहन सच लग रही है, रिश्ते-नाते सब कुछ तो सच-सच लग रहा है। इस अवस्था में आत्मा और मन का आधा-आधा जोर चलता है। नानक देव जी ने इस अवस्था को यूँ कहा है—

यो सपना पेखना, जग रचना तिम जान।
इसमें कछु साँचो नहीं, यह नानक साँची मान।

साहिब कह रहे हैं—

जागो लोगो मत सुवो, न करो नींद से प्यार।
जैसा सपना रैन का, ऐसा यह संसार ॥
यहु ऐसा संसार है, जैसा सैंबल फूल।
दिन दस व्यौहार के, झूठे रंग न भूल ॥

इसके बाद तुरीया अवस्था आती है। इसमें मन की 25 प्रतिशत ताकत रह जाती है जबकि आत्मा 75 प्रतिशत चेतन हो जाती है। इस अवस्था में ऋषि मुनि आदि पहुँच जाते हैं। बाकी तीन अवस्थाएँ तो स्वाभाविक हैं, आती जाती रहती हैं, पर चौथी स्वाभाविक नहीं है। इसे जीवित मरना भी कहा गया है, यानी जीते जी मरकर इस अवस्था को प्राप्त किया जा सकता है। यह जीते जी मरना कोई ज़हर खाकर मरना नहीं है, आत्महत्या करना नहीं है। यह अध्यात्म की कहानी है, समाधि वाली बात है। पर कलयुग में कुछ अटपटी बातें हो रही हैं।

एक जगह अध्यात्म पर बातचीत हो रही थी। बीच में गधों का ज़िकर आ गया। एक संत ने फरमाया कि गधे भी समाधि लगाना सीख