मनहिं निरंजन सबै नचाए
Manhin Niranjan Sabai Nachaye
by सतगुरु मधु परमहंस जी
Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)
Page 36 of 120
Read in contextदर्शन संसार के लिए हितकारी है। वो अपने को मुक्त और दूसरों को बँधा हुआ मानता है, अपने को सबसे बड़ा और दूसरों को छोटा समझता है। ये विद्या और तपस्या—दोनों के अहंकार बहुत बड़े हैं। फिर रूप का अहंकार नारी करती है। धन का अभिमानी कहता है कि दूसरों को ख़रीद लूँगा। फिर बल का अहंकार, ऊँचे कुल का अहंकार, कुटुंब, नौकर-चाकर का अहंकार भी यह मनुष्य मन में रखता है।
ये पाँचों बुरा काम करने वाले हैं; इसलिए यह मन बहुत ही बुरा है। साहिब कहते हैं कि प्रत्येक मनुष्य के भीतर एक युद्ध चल रहा है। ये सभी मनुष्य को अंदर से संताप दे रहे हैं। कोई भी इनसे सावधान नहीं है। हम सब किसी रोग की दवा लेने जाते हैं, पर उसकी जड़ नहीं दूँढ़ते हैं। जितने भी रोग हैं, वो सब अन्दर के इन पाँच महारोगों से उत्पन्न होते हैं। ये सभी आत्मा के भीतर का आनन्द लूट रहे हैं। आत्मा अनजाने में इन ठगों द्वारा ठगी जा रही है। उसका प्रकाश लुप्त हो गया है। तुलसी साहिब चेता रहे हैं—
चश्म दिल से देख तू, क्या-क्या तमाशे हो रहे।
दिल सतां क्या-क्या हैं तेरे, दिल सताने के लिए।
इस दिल का हुजरा साफ़ कर, जाना के आने के लिए।
ध्यान औरों का उठा, उसको बिठाने के लिए।
एक दिल लाखों तमन्ना, उस पर भी ज्यादा हवस।
फिर ठिकाना है कहाँ, उसको बिठाने के लिए॥
मैं 'मन' ही जन्म-मरण के क्रम बनाता हूँ।।
मैं ही देव और दानवों का कर्ता जग संचालक हूँ।।
मैं ही योग ध्यान में सिद्धि निधियों का वाहक हूँ।।
मैं ही त्रिकुटि मध्य बसा, दसवें द्वार विराजित हूँ।।