मनहिं निरंजन सबै नचाए
Manhin Niranjan Sabai Nachaye
by सतगुरु मधु परमहंस जी
Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)
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Read in contextको छोटा बना देता है। इस अहंकार के छः अंग हैं। जब जीव की बुद्धि का नाश हो जाता है तो देही को पकड़ लेती है अर्थात तब जीव देही के विषय में ही सोचने लगता है, उसी के सुख के लिए काम करने लगता है। देह तो वासना से भरी हुई है। इसे दूर करके ही जीव सुखी हो सकता है। जब तक मन में वासना रहती है, तब तक विषयों के जंगल में ही घूमता रहता है। जो जीव शरीर का अभिमान करता है, वो मुक्ति का पात्र नहीं हो सकता है और जब वही निर्व्यासिक हो जाता है तो साधु होकर जग में पूजा जाता है। लेकिन जिनके दिल में अभिमान रहता है, उनको कभी भी ज्ञान नहीं हो सकता है।
प्रथम कहौं विद्या अभिमानी। दुतिये तपसी तक जिन ठानी ॥
विद्या के अभिमानी जोईं। तिनके मत विचार अस होईं ॥
हमही मनुष और सब पशु गन। जिनके हृदय न विद्या को धन ॥
विद्या धन सर्वापर गाईं। ताते हम ईश्वर लखि पाईं ॥
जग में हम सबके शिर ताजा। हमरे हाथ है काज अकाजा ॥
दुतिये तपसिन केर समाजा। बिना मान नहिं कोई ऋषि राजा ॥
सो ऐसो निजु महि विचारी। दरश हमार जक्त हितकारी ॥
आपको मुक्त युक्त लख औरा। और तुच्छ हम सब शिरमौरा ॥
ये दोनों पद को मद भारी। रूप गर्व धारत है नारी ॥
धन अभिमानी पुनि अस बोला। मैं चाहों औरहि लेव मोला ॥
बलमद कुलमद कुटुंब अरु चाकर। शिखशाखा बहु मन धरे नर ॥
कह रहे हैं कि पहले विद्या के अभिमानी होते हैं। दूसरे तपस्या के अभिमानी होते हैं। जो विद्या के अभिमानी होते हैं, उन्हें यह अहंकार रहता है कि हम ही मनुष्य हैं और बाकी पशु समान हैं, जिनके पास विद्या रूपी धन नहीं है। यह विद्या रूपी धन सबसे बड़ा है। वो सोचता है कि मैं इसी से ईश्वर को पा लूँगा। वो सोचता है कि मैं ही सबके सिर का ताज हूँ, मेरे द्वारा ही सारे काम होते हैं। फिर दूसरा तपस्या का अहंकार होता है। बिना अहंकार के कोई ऋषि नहीं होता है। वो सोचता है कि हमारा