मनहिं निरंजन सबै नचाए
Manhin Niranjan Sabai Nachaye
by सतगुरु मधु परमहंस जी
Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)
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Read in contextकौरव पाण्डव क्रोधहि जारे । आपहि आप गये सब मारे ॥
ब्रह्मा जी सृष्टि के कर्ता हैं। भाइयो, यह मामूली बात नहीं है, विचार करना होगा। छह पुत्रों को शाप देकर भस्म कर डाला। सनकादिक ऋषि वैकुण्ठ में जा रहे थे तो जय-विजय नामक द्वारपालों ने अन्दर नहीं जाने दिया। ओह, इतना बड़ा ऋषि, मुझे रोका। क्रोध आ गया सनकादिक को और बस, दे डाला शाप, कहा—जाओ, तीन जन्म के लिए राक्षस हो जाओ। शिवजी क्रोध करते हैं तो तीन-लोक में प्रलय कर देते हैं। यह तो सब जानते हैं। दुर्वासा ऋषि क्रोध को न जीत सके और 56 कोटि यादवों को शाप देकर भस्म कर डाला।
देखा न, कितने बड़े बड़ों को वश में कर रखा है इसने! सारा संसार इसकी चपेट में है।
क्रोध अग्नि घट घट बरी, जरत सकल संसार ।
दीन लीन निज भक्ति सो, ताकर निकट उबार ॥
दसो दिशा ते उठी परबल क्रोध की आग ।
संगति शीतल साधु की, शरण उबरिये भाग ॥
संतों की शरण में जाकर ही इससे बचा जा सकता है, अन्यथा पूरा संसार इस क्रोध की आग में जल रहा है।
कहैं कबीर क्रोध परहरै । सोई प्राणी भवसागर तरै ॥
क्षण क्षण क्रोध हृदय में आवै । जप तप ज्ञान रहन नहिं पावै ॥
पंडित गुणी योगी वैरागी । ये सब जरें क्रोध की आगी ॥
पंच अग्नि ग्रीष्म ऋतु धरई । ऐसी विधि त्रिकाल तप करई ॥
पाँचो इंद्री करै निरासा । साथे निद्रा भूख पियासा ॥
जतन जतन बहुत तप करहीं । क्रोध छुड़ाय छन एकमहँ हरहीं ॥
सिद्ध काज विनासै क्रोधा । सब फल जाइ न पावै सोधा ॥
इस क्रोध को जो त्याग देता है, वो भवसागर से पार हो जाता है। जब यह क्रोध हृदय में आ जाता है तो जप, तप, ज्ञान कुछ भी रहने नहीं देता है। चाहे कोई पाँचों इंद्रियों को साथ ले, भूख, नींद आदि को भी वश