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मनहिं निरंजन सबै नचाए

मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

by सतगुरु मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished120 pages

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तन मन लज्जा ना रहै, काम बाण उर साल ॥

एक काम सब बसि किये, सुर नर मुनि विहाल ॥

इस तरह यह काम बड़ा प्रबल है, जो तपस्वियों का तप नहीं रहने देता। देवता लोगों को भी यह अपने वश में रखता है। आम आदमी की तो बात ही क्या करनी। यह नहीं सोचना कि इस काम ने बड़े-बड़े तपस्वियों को ही नचाया है। याद रहे, मन भी इस काम के वश में है।

मन पाँचों के वश पड़ा, मन के वश नहीं पाँच।

जित देखूँ तित धौ लगी, जित भागूँ तित आँच ॥

इसके बाद आता है—क्रोध। साहिब कहते हैं—‘काम से अधिक क्रोध प्रचण्डा, जा के डर त्रासे नौ खण्डा’। क्रोध का बेटा है—अविचार। यानी विचार नहीं करना है। जब भी क्रोध आता है तो विचार नहीं करने देता है। अन्दर में दैवी गुणों को दबा कर रखता है। इसकी बहू है—भूल। कहते हैं कि भूल गया। यह बहू है। लोभ का परिवार भी है। तृष्णा इसकी स्त्री है। लोभ से इंसान पूरे पाप करता है। झूठ इसकी बहू है। पाप पुत्र है।

अस असुर घट में बसे, कै से रहे कुशल ॥

ये सब भी बहुत बुरे हैं। जब भी मनुष्य में क्रोध उठता है तो उसके मस्तिष्क पर एक पर्दा-सा छा जाता है। फिर उसे अपना पराया कुछ भी नहीं सूझता है और बड़े-बड़े मूर्खों वाले काम हो जाते हैं..... मनुष्य गाली बकता है, मारपीट करता है, आपे से बाहर हो जाता है; पर बाद में पछताना पड़ता है। क्रोध ने समय-समय पर इस संसार का बड़ा विनाश किया है। साहिब कह रहे हैं—

प्रथमें क्रोध ब्रह्मा को भयऊ। षट पुत्रन कहँ शाप जो दयऊ ॥
सनकादिक वैकुंठे गयऊ। रोकत पौरी क्रोध मन भयऊ ॥
जब जब शिव क्रोध करै संसारा। परलय होत न लागे बारा ॥
दुरवासा क्रोध न सहेऊ। उलटी हानी तप में भयेऊ ॥
छप्पन कोटि यादव संधारा। आपुहिं आप क्रोध परजारा ॥