महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextपञ्चनवतितमोऽध्यायः
छत्र और उपानहकी उत्पत्ति एवं दानविषयक युधिष्ठिरका प्रश्न तथा सूर्यकी प्रचण्ड धूपसे रेणुकाका मस्तक और पैरोंके संतप्त होनेपर जमदग्निका सूर्यपर कुपित होना और विप्ररूपधारी सूर्यसे वार्तालाप
युधिष्ठिर उवाच
यदिदं श्राद्धकृत्येषु दीयते भरतर्षभ ।
छत्रं चोपानहौ चैव केनैतत् सम्प्रवर्तितम् ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**भरतश्रेष्ठ! श्राद्धकर्मोंमें जिनका दान दिया जाता है, उन छत्र और उपानहोंके दानकी प्रथा किसने चलायी है? ॥ १ ॥
कथं चैतत् समुत्पन्नं किमर्थं चैव दीयते ।
न केवलं श्राद्धकृत्ये पुण्यकेष्वपि दीयते ॥ २ ॥
इनकी उत्पत्ति कैसे हुई और किसलिये इनका दान किया जाता है? केवल श्राद्धकर्ममें ही नहीं, अनेक पुण्यके अवसरोंपर भी इनका दान होता है ॥ २ ॥
बहुष्वपि निमित्तेषु पुण्यमाश्रित्य दीयते ।
एतद् विस्तरशो राजन् श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ ३ ॥
बहुत-से निमित्त उपस्थित होनेपर पुण्यके उद्देश्यसे इन वस्तुओंके दानकी प्रथा देखी जाती है। अतः राजन्! मैं इस विषयको विस्तारके साथ यथावत् रूपसे सुनना चाहता हूँ ॥ ३ ॥
भीष्म उवाच
शृणु राजन्नवहितश्छत्रोपानहविस्तरम् ।
यथैतत् प्रथितं लोके यथा चैतत् प्रवर्तितम् ॥ ४ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! छाते और जूतेकी उत्पत्तिकी वार्ता मैं विस्तारके साथ बता रहा हूँ, सावधान होकर सुनो। संसारमें किस प्रकार इनके दानका आरम्भ हुआ और कैसे उस दानका प्रचार हुआ, यह सब श्रवण करो ॥ ४ ॥
यथा चाक्षय्यतां प्राप्तं पुण्यतां च यथा गतम् ।
सर्वमेतदशेषेण प्रवक्ष्यामि नराधिप ॥ ५ ॥
नरेश्वर! इन दोनों वस्तुओंका दान किस तरह अक्षय होता है, तथा ये किस प्रकार पुण्यकी प्राप्ति करानेवाली मानी गयी हैं। इन सब बातोंका मैं पूर्णरूपसे वर्णन