सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 71, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 71

‘सुमध्यमे! इसीलिये तुम्हारे लिये नियत किये गये चरु और वृक्षमें मेरा अनुराग हुआ है। तुम भी यही चिन्तन करो कि मेरा भाई किसी तरह श्रेष्ठ गुणोंसे सम्पन्न हो’ ॥ ३४ ॥
तथा च कृतवत्यौ ते माता सत्यवती च सा ।
अथ गर्भावनुप्राप्ते उभे ते वै युधिष्ठिर ॥ ३५ ॥
युधिष्ठिर! इस तरह सलाह करके सत्यवती और उसकी माताने उसी तरह उन दोनों वस्तुओंका अदल-बदलकर उपयोग किया। फिर तो वे दोनों गर्भवती हो गयीं ॥ ३५ ॥
दृष्ट्वा गर्भमनुप्राप्तां भार्यां स च महानृषिः ।
उवाच तां सत्यवतीं दुर्मना भृगुसत्तमः ॥ ३६ ॥
अपनी पत्नी सत्यवतीको गर्भवती अवस्थामें देखकर भृगुश्रेष्ठ महर्षि ऋचीकका मन खिन्न हो गया ॥
व्यत्यासेनोपयुक्तस्ते चरुर्व्यक्तं भविष्यति ।
व्यत्यासः पादपे चापि सुव्यक्तं ते कृतः शुभे ॥ ३७ ॥
उन्होंने कहा—‘शुभे! जान पड़ता है तुमने बदलकर चरुका उपयोग किया है। इसी तरह तुमलोगोंने वृक्षोंके आलिंगनमें भी उलट-फेर कर दिया है—ऐसा स्पष्ट प्रतीत हो रहा है ॥ ३७ ॥
मया हि विश्वं यद्ब्रह्म त्वच्चरौ संनिवेशितम् ।
क्षत्रवीर्यं च सकलं चरौ तस्या निवेशितम् ॥ ३८ ॥
‘मैंने तुम्हारे चरुमें सम्पूर्ण ब्रह्मतेजका संनिवेश किया था और तुम्हारी माताके चरुमें समस्त क्षत्रियोचित शक्तिकी स्थापना की थी’ ॥ ३८ ॥
त्रैलोक्यविख्यातगुणं त्वं विप्रं जनयिष्यसि ।
सा च क्षत्रं विशिष्टं वै तत एतत् कृतं मया ॥ ३९ ॥
‘मैंने सोचा था कि तुम त्रिभुवनमें विख्यात गुणवाले ब्राह्मणको जन्म दोगी और तुम्हारी माता सर्वश्रेष्ठ क्षत्रियकी जननी होगी। इसीलिये मैंने दो तरहके चरुओंका निर्माण किया था ॥ ३९ ॥
व्यत्यासस्तु कृतो यस्मात् त्वया मात्रा च ते शुभे ।
तस्मात् सा ब्राह्मणं श्रेष्ठं माता ते जनयिष्यति ॥ ४० ॥
क्षत्रियं तूग्रकर्माणं त्वं भद्रे जनयिष्यसि ।
न हि ते तत् कृतं साधु मातृस्नेहेन भाविनि ॥ ४१ ॥
‘शुभे! तुमने और तुम्हारी माताने अदला-बदली कर ली है, इसलिये तुम्हारी माता श्रेष्ठ ब्राह्मणपुत्रको जन्म देगी और भद्रे! तुम भयंकर कर्म करनेवाले क्षत्रियकी जननी होओगी। भाविनि! माताके स्नेहमें पड़कर तुमने यह अच्छा काम नहीं किया’ ॥ ४०-४१ ॥
सा श्रुत्वा शोकसंतप्ता पपात वरवर्णिनी ।
भूमौ सत्यवती राजन् छिन्नेव रुचिरा लता ॥ ४२ ॥