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सर्वकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 623, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 623

सावित्र्या ह्यपि कौन्तेय श्रुतं ते वचनं शुभम् ।। ७ ।।
यतश्च यद् यथा चैव देवसत्रे महामते ।
कुन्तीनन्दन! तुमने सावित्रीके शुभ वचनको भी सुना है। महामते देवताओंके यज्ञमें जिस हेतुसे और जिस प्रकार जो वचन सावित्रीने कहा था, वह इस प्रकार है— ।। ७ १/२ ।।
अन्ने दत्ते नरेणेह प्राणा दत्ता भवन्त्युत ।। ८ ।।
प्राणदानाद्धि परमं न दानमिह विद्यते ।
श्रुतं हि ते महाबाहो लोमशस्यापि तद्वचः ।। ९ ।।
‘जिस मनुष्यने यहाँ किसीको अन्न दिया है, उसने मानो प्राण दे दिये और प्राणदानसे बढ़कर इस संसारमें दूसरा कोई दान नहीं है।' महाबाहो! इस विषयमें तुमने लोमशका भी वह वचन सुना ही है ।। ८-९ ।।
प्राणान् दत्त्वा कपोताय यत् प्राप्तं शिबिना पुरा ।
तां गतिं लभते दत्त्वा द्विजस्यान्नं विशाम्पते ।। १० ।।
प्रजानाथ! पूर्वकालमें राजा शिबिने कबूतरके लिये प्राणदान देकर जो उत्तम गति प्राप्त की थी, ब्राह्मणको अन्न देकर दाता उसी गतिको प्राप्त कर लेता है ।। १० ।।
तस्माद् विशिष्टां गच्छन्ति प्राणदा इति नःश्रुतम् ।
अन्नं वापि प्रभवति पानीयात् कुरुसत्तम ।
नीरजातेन हि विना न किंचित् सम्प्रवर्तते ।। ११ ।।
कुरुश्रेष्ठ! अतः प्राणदान करनेवाले पुरुष श्रेष्ठ गतिको प्राप्त होते हैं—ऐसा हमने सुना है। किंतु अन्न भी जलसे ही पैदा होता है। जलराशिसे उत्पन्न हुए धान्यके बिना कुछ भी नहीं हो सकता ।। ११ ।।
नीरजातश्च भगवान् सोमो ग्रहगणेश्वरः ।
अमृतं च सुधा चैव स्वाहा चैव स्वधा तथा ।। १२ ।।
अन्नौषध्यो महाराज वीरुधश्च जलोद्भवाः ।
यतः प्राणभृतां प्राणाः सम्भवन्ति विशाम्पते ।। १३ ।।
महाराज! ग्रहोंके अधिपति भगवान् सोम जलसे ही प्रकट हुए हैं। प्रजानाथ! अमृत, सुधा, स्वाहा, स्वधा, अन्न, ओषधि, तृण और लताएँ भी जलसे उत्पन्न हुई हैं, जिनसे समस्त प्राणियोंके प्राण प्रकट एवं पुष्ट होते हैं ।। १२-१३ ।।
देवानाममृतं ह्यन्नं नागानां च सुधा तथा ।
पितॄणां च स्वधा प्रोक्ता पशूनां चापि वीरुधः ।। १४ ।।
देवताओंका अन्न अमृत, नागोंका अन्न सुधा, पितरोंका अन्न स्वधा और पशुओंका अन्न तृण-लता आदि है ।। १४ ।।
अन्नमेव मनुष्याणां प्राणानाहुर्मनीषिणः ।
तच्च सर्वं नरव्याघ्र पानीयात् सम्प्रवर्तते ।। १५ ।।