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सर्वकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 50, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 50

धर्मोऽहमस्मि भद्रं ते जिज्ञासार्थं तवानघ ।
प्राप्तः सत्यं च ते ज्ञात्वा प्रीतिर्मे परमा त्वयि ॥ ७९ ॥
‘निष्पाप सुदर्शन! तुम्हारा कल्याण हो। मैं धर्म हूँ और तुम्हारी परीक्षा लेनेके लिये यहाँ आया हूँ। तुममें सत्य है—यह जानकर मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हुआ हूँ ।। ७९ ।।

विजितश्च त्वया मृत्युर्योऽयं त्वामनुगच्छति ।
रन्ध्रान्वेषी तव सदा त्वया धृत्या वशी कृतः ॥ ८० ॥
‘तुमने इस मृत्युको, जो सदा तुम्हारा छिद्र ढूँढ़ती हुई तुम्हारे पीछे लगी रहती थी, जीत लिया। तुमने अपने धैर्यसे मृत्युको वशमें कर लिया है ।। ८० ।।

न चास्ति शक्तिस्त्रैलोक्ये कस्यचित् पुरुषोत्तम ।
पतिव्रतामिमां साध्वीं तवोद्वीक्षितुमप्युत ॥ ८१ ॥
‘पुरुषोत्तम! तीनों लोकोंमें किसीकी भी ऐसी शक्ति नहीं है जो तुम्हारी इस सती-साध्वी पतिव्रता पत्नीकी ओर कलुषित भावनासे आँख उठाकर देख भी सके’ ।। ८१ ।।

रक्षिता त्वद्गुणैरेषा पतिव्रतगुणैस्तथा ।
अधृष्या यदियं ब्रूयात् तथा तन्नान्यथा भवेत् ॥ ८२ ॥
‘यह तुम्हारे गुणोंसे तथा अपने पातिव्रत्यके गुणोंद्वारा भी सदा सुरक्षित है। कोई भी इसका पराभव नहीं कर सकता। यह जो बात अपने मुँहसे निकालेगी वह सत्य ही होगी।