महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextविंशोऽध्यायः
नारदजीका प्राचीन राजर्षियोंकी तपःसिद्धिका दृष्टान्त देकर धृतराष्ट्रकी तपस्याविषयक श्रद्धाको बढ़ाना तथा शतयूपके पूछनेपर धृतराष्ट्रको मिलनेवाली गतिका भी वर्णन करना
वैशम्पायन उवाच
ततस्तत्र मुनिश्रेष्ठा राजानं द्रष्टुमभ्ययुः ।
नारदः पर्वतश्चैव देवलश्च महातपाः ॥ १ ॥
द्वैपायनः सशिष्यश्च सिद्धाश्चान्ये मनीषिणः ।
शतयूपश्च राजर्षिर्वृद्धः परमधार्मिकः ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर वहाँ राजा धृतराष्ट्रसे मिलनेके लिये नारद, पर्वत, महातपस्वी देवल, शिष्योंसहित महर्षि व्यास तथा अन्यान्य सिद्ध, मनीषी, श्रेष्ठ मुनिगण आये। उनके साथ परम धर्मात्मा वृद्ध राजर्षि शतयूप भी पधारे थे ॥ १-२ ॥
तेषां कुन्ती महाराज पूजां चक्रे यथाविधि ।
ते चापि तुतुषुस्तस्यास्तापसाः परिचर्यया ॥ ३ ॥
महाराज! कुन्तीदेवीने उन सबकी यथायोग्य पूजा की। वे तपस्वी ऋषि भी कुन्तीकी सेवासे बहुत संतुष्ट हुए ॥ ३ ॥
तत्र धर्म्याः कथास्तात चक्रुस्ते परमर्षयः ।
रमयन्तो महात्मानं धृतराष्ट्रं जनाधिपम् ॥ ४ ॥
तात! वहाँ उन महर्षियोंने महात्मा राजा धृतराष्ट्रका मन लगानेके लिये अनेक प्रकारकी धार्मिक कथाएँ कहीं ॥
कथान्तरे तु कस्मिंश्चिद् देवर्षिर्नारदस्ततः ।
कथामिमामकथयत् सर्वप्रत्यक्षदर्शिवान् ॥ ५ ॥
सब कुछ प्रत्यक्ष देखनेवाले देवर्षि नारदने किसी कथाके प्रसंगमें यह कथा कहनी आरम्भ की ॥ ५ ॥
नारद उवाच
केकयाधिपतिः श्रीमान् राजाऽऽसीदकुतोभयः ।
सहस्रचित्य इत्युक्तः शतयूपपितामहः ॥ ६ ॥
**नारदजी बोले—**राजन्! पूर्वकालमें सहस्रचित्य नामसे प्रसिद्ध एक तेजस्वी राजा थे, जो केकयदेशकी प्रजाका पालन करते थे। उन्हें कभी किसीसे भय नहीं होता था। यहाँ जो ये राजर्षि शतयूप विराज रहे हैं, इनके वे पितामह थे ॥ ६ ॥