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सर्वकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2080, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2080

योगी तथा पाँचों उपासना करनेवाले भगवद्भक्त पुरुष उत्तम वैष्णव-धर्मका उपदेश सुनने तथा भगवान्‌की बात हृदयमें धारण करनेके लिये अत्यन्त उत्कण्ठित होकर वहाँ आये। उनके इन्द्रिय और मन अत्यन्त हर्षित हो रहे थे। आनेके बाद उन सबने मस्तक झुकाकर भगवान्‌को प्रणाम किया॥

ततस्तान् वासुदेवेन दृष्टान् दिव्येन चक्षुषा।
विमुक्तपापानालोक्य प्रणम्य शिरसा हरिम्।
पप्रच्छ केशवं धर्मं धर्मपुत्रः प्रतापवान्॥

भगवान्‌की दिव्य दृष्टि पड़नेसे वे सब निष्पाप हो गये। उन्हें उपस्थित देखकर महाप्रतापी धर्मपुत्र युधिष्ठिरने भगवान्‌को प्रणाम करके इस प्रकार धर्मविषयक प्रश्न किया॥

युधिष्ठिर उवाच

कीदृशी ब्राह्मणस्याथ क्षत्रियस्यापि कीदृशी।
वैश्यस्य कीदृशी देव गतिः शूद्रस्य कीदृशी॥

**युधिष्ठिरने पूछा—**देवेश्वर! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रकी पृथक्-पृथक् कैसी गति होती है?॥

श्रीभगवानुवाच

शृणु वर्णक्रमेणैव धर्मं धर्मभृतां वर।
नास्ति किंचिन्नरश्रेष्ठ ब्राह्मणस्य तु दुष्कृतम्॥

**श्रीभगवान्‌ने कहा—**नरश्रेष्ठ धर्मराज! ब्राह्मणादि वर्णोंके क्रमसे धर्मका वर्णन सुनो। ब्राह्मणके लिये कुछ भी दुष्कर नहीं है॥

शिखायज्ञोपवीता ये संध्यां ये चाप्युपासते।
यैश्च पूर्णाहुतिः प्राप्ता विधिवज्जुह्वते च ये॥
वैश्वदेवं च ये चक्रुः पूजयन्त्यतिथींश्च ये।
नित्यं स्वाध्यायशीलाश्च जपयज्ञपराश्च ये॥
सायं प्रातर्हुताशाश्च शूद्रभोजनवर्जिताः।
दम्भानृतविमुक्ताश्च स्वदारनिरताश्च ये।
पञ्चयज्ञपरा ये च येऽग्निहोत्रमुपासते॥
दहन्ति दुष्कृतं येषां हूयमानास्त्रयोऽग्नयः।
नष्टदुष्कृतकर्माणो ब्रह्मलोकं व्रजन्ति ते॥

जो ब्राह्मण शिखा और यज्ञोपवीत धारण करते हैं, संध्योपासना करते हैं, पूर्णाहुति देते हैं, विधिवत् अग्निहोत्र करते हैं, बलिवैश्वदेव और अतिथियोंका पूजन करते हैं, नित्य स्वाध्यायमें लगे रहते हैं तथा जप-यज्ञके परायण हैं; जो प्रातःकाल और सायंकाल होम