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सर्वकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1945, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1945

आये ।। १० ।।
ततः शब्दो महाराज दिशः खं प्रति पूरयन् ।
बभूव प्रेक्षतां नृणां कुन्तीपुत्रं धनंजयम् ।। ११ ।।
महाराज! उस समय कुन्तीपुत्र धनंजयका दर्शन करनेवाले लोगोंके मुखसे जो शब्द निकलता था, वह सम्पूर्ण दिशाओं और आकाशमें गूँज रहा था ।। ११ ।।
एष गच्छति कौन्तेय तुरगश्चैव दीप्तिमान् ।
यमन्वेति महाबाहुः संस्पृशन् धनुरुत्तमम् ।। १२ ।।
(लोग कहते थे—) 'ये कुन्तीकुमार अर्जुन जा रहे हैं और वह दीप्तिमान् अश्व जा रहा है, जिसके पीछे महाबाहु अर्जुन उत्तम धनुष धारण किये जा रहे हैं' ।। १२ ।।
एवं शुश्राव वदतां गिरो जिष्णुरुदारधीः ।
स्वस्ति तेऽस्तु व्रजारिष्टं पुनश्चैहीति भारत ।। १३ ।।
उदारबुद्धि अर्जुनने परस्पर वार्तालाप करते हुए लोगोंकी बातें इस प्रकार सुनीं—'भारत! तुम्हारा कल्याण हो। तुम सुखसे जाओ और पुनः कुशलपूर्वक लौट आओ' ।। १३ ।।
अथापरे मनुष्येन्द्र पुरुषा वाक्यमब्रुवन् ।
नैनं पश्याम सम्मर्दे धनुरेतत् प्रदृश्यते ।। १४ ।।
एतद्धि भीमनिर्ह्रादं विश्रुतं गाण्डिवं धनुः ।
स्वस्ति गच्छत्वरिष्टो वै पन्थानमकुतोभयम् ।। १५ ।।
निवृत्तमेनं द्रक्ष्यामः पुनरेष्यति च ध्रुवम् ।
नरेन्द्र! दूसरे लोग ये बातें कहते थे—'इस भीड़में हम अर्जुनको तो नहीं देखते हैं; किंतु उनका यह धनुष दिखायी देता है। यही वह भयंकर टंकार करनेवाला विख्यात गाण्डीव धनुष है। अर्जुनकी यात्रा सकुशल हो। उन्हें मार्गमें कोई कष्ट न हो। ये निर्भय मार्गपर आगे बढ़ते रहें। ये निश्चय ही कुशलपूर्वक लौटेंगे और उस समय हम फिर इनका दर्शन करेंगे' ।। १४-१५ १/२ ।।
एवमाद्या मनुष्याणां स्त्रीणां च भरतर्षभ ।। १६ ।।
शुश्राव मधुरा वाचः पुनः पुनरुदारधीः ।
भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार उदारबुद्धि अर्जुन स्त्रियों और पुरुषोंकी कही हुई मीठी-मीठी बातें बारंबार सुनते थे ।। १६ १/२ ।।
याज्ञवल्क्यस्य शिष्यश्च कुशलो यज्ञकर्मणि ।। १७ ।।
प्रायात् पार्थेन सहितः शान्त्यर्थं वेदपारगः ।
याज्ञवल्क्य मुनिके एक विद्वान् शिष्य, जो यज्ञकर्ममें कुशल तथा वेदोंमें पारंगत थे, विघ्नकी शान्तिके लिये अर्जुनके साथ गये ।। १७ १/२ ।।
ब्राह्मणाश्च महीपाल बहवो वेदपारगाः ।। १८ ।।