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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,566 pages

Page 1774 of 2566

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Page 1774

प्रलयकालमें लय नहीं होता। जो (स्थूल पदार्थ) अनित्य हैं उनको मोहके नामसे पुकारा जाता है ॥ ६ ॥

लोभप्रजनसम्भूता निर्विशेषा ह्यकिंचनाः ।
मांसशोणितसंघाता अन्योन्योपजीविनः ॥ ७ ॥
बहिरात्मान इत्येते दीनाः कृपणजीविनः ।
लोभ, लोभपूर्वक किये जानेवाले कर्म और उन कर्मोंसे उत्पन्न समस्त फल समानभावसे वास्तवमें कुछ भी नहीं है। शरीरके बाह्य अंग रक्त-मांसके संघात आदि एक-दूसरेके सहारे रखनेवाले हैं। इसीलिये ये दीन और कृपण माने गये हैं ॥ ७ ½ ॥

प्राणापानावुदानश्च समानो व्यान एव च ॥ ८ ॥
अन्तरात्मनि चाप्येते नियताः पञ्च वायवः ।
वाङ्मनोबुद्धिभिः सार्द्धमिदमष्टात्मकं जगत् ॥ ९ ॥
प्राण, अपान, उदान, समान और व्यान—ये पाँच वायु नियतरूपसे शरीरके भीतर निवास करते हैं; अतः ये सूक्ष्म हैं। मन, वाणी और बुद्धिके साथ गिननेसे इनकी संख्या आठ होती है। ये आठ इस जगत्के उपादान कारण हैं ॥ ८-९ ॥

त्वग्घ्राणश्रोत्रचक्षूंषि रसना वाक् च संयताः ।
विशुद्धं च मनो यस्य बुद्धिश्चाव्यभिचारिणी ॥ १० ॥
अष्टौ यस्याग्नयो ह्येते न दहने मनः सदा ।
स तद् ब्रह्म शुभं याति तस्माद् भूयो न विद्यते ॥ ११ ॥
जिसकी त्वचा, नासिका, कान, आँख, रसना और वाक्—ये इन्द्रियाँ वशमें हों, मन शुद्ध हो और बुद्धि एक निश्चयपर स्थिर रहनेवाली हो तथा जिसके मनको उपर्युक्त इन्द्रियादिरूप आठ अग्नियाँ संतप्त न करती हों, वह पुरुष उस कल्याणमय ब्रह्मको प्राप्त होता है, जिससे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है ॥ १०-११ ॥

एकादश च यान्याहुरिन्द्रियाणि विशेषतः ।
अहंकारात् प्रसूतानि तानि वक्ष्याम्यहं द्विजाः ॥ १२ ॥
द्विजवरो! अहंकारसे उत्पन्न हुई जो मनसहित ग्यारह इन्द्रियाँ बतलायी जाती हैं, उनका अब विशेषरूपसे वर्णन करूँगा, सुनो ॥ १२ ॥

श्रोत्रं त्वक् चक्षुषी जिह्वा नासिका चैव पञ्चमी ।
पादौ पायुरुपस्थश्च हस्तौ वाग् दशमी भवेत् ॥ १३ ॥
इन्द्रियग्राम इत्येष मन एकादशं भवेत् ।
एतं ग्रामं जयेत् पूर्वं ततो ब्रह्म प्रकाशते ॥ १४ ॥
कान, त्वचा, आँख, रसना, पाँचवीं नासिका तथा हाथ, पैर, गुदा, उपस्थ और वाक्—यह दस इन्द्रियोंका समूह है। मन ग्यारहवाँ है। मनुष्यको पहले इस समुदायपर विजय प्राप्त करना चाहिये। तत्पश्चात् उसे ब्रह्मका साक्षात्कार होता है ॥ १३-१४ ॥