महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextद्विचत्वारिंशोऽध्यायः
अहंकारसे पञ्च महाभूतों और इन्द्रियोंकी सृष्टि, अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवतका वर्णन तथा निवृत्तिमार्गका उपदेश
ब्रह्मोवाच
अहंकारात् प्रसूतानि महाभूतानि पञ्च वै ।
पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् ॥ १ ॥
**ब्रह्माजीने कहा—**महर्षिगण! अहंकारसे पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और पाँचवाँ तेज—ये पञ्च महाभूत उत्पन्न हुए हैं ॥ १ ॥
तेषु भूतानि मुह्यन्ति महाभूतेषु पञ्चसु ।
शब्दस्पर्शनरूपेषु रसगन्धक्रियासु च ॥ २ ॥
इन्हीं पञ्च महाभूतोंमें अर्थात् इनके शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध नामक विषयोंमें समस्त प्राणी मोहित रहते हैं ॥ २ ॥
महाभूतविनाशान्ते प्रलये प्रत्युपस्थिते ।
सर्वप्राणभृतां धीरा महदभ्युद्यते भयम् ॥ ३ ॥
धैर्यशाली महर्षियो! महाभूतोंका नाश होते समय जब प्रलयका अवसर आता है, उस समय समस्त प्राणियोंको महान् भय प्राप्त होता है ॥ ३ ॥
यद् यस्माज्जायते भूतं तत्र तत् प्रविलीयते ।
लीयन्ते प्रतिलोमानि जायन्ते चोत्तरोत्तरम् ॥ ४ ॥
जो भूत जिससे उत्पन्न होता है, उसका उसीमें लय हो जाता है। ये भूत अनुलोमक्रमसे एकके बाद एक प्रकट होते हैं और विलोमक्रमसे इनका अपने-अपने कारणमें लय होता है ॥ ४ ॥
ततः प्रलीने सर्वस्मिन् भूते स्थावरजङ्गमे ।
स्मृतिमन्तस्तदा धीरा न लीयन्ते कदाचन ॥ ५ ॥
इस प्रकार सम्पूर्ण चराचर भूतोंका लय हो जानेपर भी स्मरणशक्तिसे सम्पन्न धीर-हृदय योगी पुरुष कभी नहीं लीन होते ॥ ५ ॥
शब्दः स्पर्शस्तथा रूपं रसो गन्धश्च पञ्चमः ।
क्रियाः करणनित्याः स्युरनित्या मोहसंज्ञिताः ॥ ६ ॥
शब्द, स्पर्श, रूप, रस और पाँचवाँ गन्ध तथा इनको ग्रहण करनेकी क्रियाएँ—ये कारणरूपसे (अर्थात् सूक्ष्म मनःस्वरूप होनेके कारण) नित्य हैं; अतः इनका भी