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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,566 pages

Page 1680 of 2566

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Page 1680

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विंशोऽध्यायः

ब्राह्मणगीता—एक ब्राह्मणका अपनी पत्नीसे ज्ञानयज्ञका उपदेश करना

वासुदेव उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
दम्पत्योः पार्थ संवादो योऽभवद् भरतर्षभ ॥ १ ॥

**श्रीकृष्ण कहते हैं—**भरतश्रेष्ठ! अर्जुन! इसी विषयमें पति-पत्नीके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ॥ १ ॥

ब्राह्मणी ब्राह्मणं कंचिज्ज्ञानविज्ञानपारगम् ।
दृष्ट्वा विविक्त आसीनं भार्या भर्तारमब्रवीत् ॥ २ ॥
कं नु लोकं गमिष्यामि त्वामहं पतिमाश्रिता ।
न्यस्तकर्माणमासीनं कीनाशमविचक्षणम् ॥ ३ ॥
भार्याः पतिकृताँल्लोकानाप्नुवन्तीति नः श्रुतम् ।
त्वामहं पतिमासाद्य कां गमिष्यामि वै गतिम् ॥ ४ ॥

एक ब्राह्मण, जो ज्ञान-विज्ञानके पारगामी विद्वान् थे, एकान्त स्थानमें बैठे हुए थे, यह देखकर उनकी पत्नी ब्राह्मणी अपने उन पतिदेवके पास जाकर बोली—‘प्राणनाथ! मैंने सुना है कि स्त्रियाँ पतिके कर्मानुसार प्राप्त हुए लोकोंको जाती हैं; किंतु आप तो कर्म छोड़कर बैठे हैं और मेरे प्रति कठोरताका बर्ताव करते हैं। आपको इस बातका पता नहीं है कि मैं अनन्यभावसे आपके ही आश्रित हूँ। ऐसी दशामें आप-जैसे पतिका आश्रय लेकर मैं किस लोकमें जाऊँगी? आपको पतिरूपमें पाकर मेरी क्या गति होगी’ ॥ २—४ ॥