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सर्वकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1617, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1617

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दशमोऽध्यायः

इन्द्रका गन्धर्वराजको भेजकर मरुत्तको भय दिखाना और संवर्तका मन्त्रबलसे इन्द्रसहित सब देवताओंको बुलाकर मरुत्तका यज्ञ पूर्ण करना

इन्द्र उवाच

एवमेतद् ब्रह्मबलं गरीयो
न ब्राह्मणात् किंचिदन्यद् गरीयः ।
आविक्षितस्य तु बलं न मृष्ये
वज्रमस्मै प्रहरिष्यामि घोरम् ॥ १ ॥
इन्द्रने कहा— यह ठीक है कि ब्रह्मबल सबसे बढ़कर है। ब्राह्मणसे श्रेष्ठ दूसरा कोई नहीं है; किंतु मैं राजा मरुत्तके बलको नहीं सह सकता। उनके ऊपर अवश्य अपने घोर वज्रका प्रहार करूँगा ॥ १ ॥
धृतराष्ट्र प्रहितो गच्छ मरुत्तं
संवर्तेन संगतं तं वदस्व ।
बृहस्पतिं त्वमुपशिक्षस्व राजन्
वज्रं वा ते प्रहरिष्यामि घोरम् ॥ २ ॥
गन्धर्वराज धृतराष्ट्र! अब तुम मेरे भेजनेसे वहाँ जाओ और संवर्तके साथ मिले हुए राजा मरुत्तसे कहो—‘राजन्! आप बृहस्पतिको आचार्य बनाकर उनसे यज्ञकर्मकी शिक्षा-दीक्षा ग्रहण कीजिये। अन्यथा मैं इन्द्र आपपर घोर वज्रका प्रहार करूँगा’ ॥ २ ॥

व्यास उवाच

ततो गत्वा धृतराष्ट्रो नरेन्द्रं
प्रोवाचेदं वचनं वासवस्य ॥ ३ ॥
गन्धर्वं मां धृतराष्ट्रं निबोध
त्वामागतं वक्तुकामं नरेन्द्र ।
ऐन्द्रं वाक्यं शृणु मे राजसिंह
यत् प्राह लोकाधिपतिर्महात्मा ॥ ४ ॥
व्यासजी कहते हैं— तब गन्धर्वराज धृतराष्ट्र राजा मरुत्तके पास गये और उनसे इन्द्रका संदेश इस प्रकार कहने लगे—‘महाराज! आपको विदित हो कि मैं धृतराष्ट्र नामक गन्धर्व हूँ और आपको देवराज इन्द्रका संदेश सुनाने आया हूँ। राजसिंह! सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी महामना इन्द्रने जो कुछ कहा है, उनका वह वाक्य सुनिये ॥ ३-४ ॥