महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1390, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंअग्निकी भार्या स्वाहा और कश्यपकी पत्नी अदिति—ये सब-की-सब पतिव्रता देवियाँ हैं। देवि! तुमने इन सबका सदा संग किया है और इन सबसे धर्मकी बात पूछी है ॥ ४—६ ॥
तेन त्वां परिपृच्छामि धर्मज्ञे धर्मवादिनि ।
स्त्रीधर्मं श्रोतुमिच्छामि त्वयोदाहृतमादितः ॥ ७ ॥
अतः धर्मवादिनि धर्मज्ञे! मैं तुमसे स्त्रीधर्मके विषयमें प्रश्न करता हूँ और तुम्हारे मुखसे वर्णित नारीधर्म आद्योपान्त सुनना चाहता हूँ ॥ ७ ॥
सधर्मचारिणी मे त्वं समशीला समव्रता ।
समानसारवीर्या च तपस्तीव्रं कृतं च ते ॥ ८ ॥
तुम मेरी सहधर्मिणी हो। तुम्हारा शील-स्वभाव तथा व्रत मेरे समान ही है। तुम्हारी सारभूत शक्ति भी मुझसे कम नहीं है। तुमने तीव्र तपस्या भी की है ॥ ८ ॥
त्वया ह्युक्तो विशेषेण गुणवान् स भविष्यति ।
लोके चैव त्वया देवि प्रमाणत्वमुपैष्यति ॥ ९ ॥
अतः देवि! तुम्हारे द्वारा कहा गया स्त्रीधर्म विशेष गुणवान् होगा और लोकमें प्रमाणभूत माना जायगा ॥ ९ ॥
स्त्रियश्चैव विशेषेण स्त्रीजनस्य गतिः परा ।
गौर्यां गच्छति सुश्रोणि लोकेष्वेषा गतिः सदा ॥ १० ॥
विशेषतः स्त्रियाँ ही स्त्रियोंकी परम गति हैं। सुश्रोणि! संसारमें भूतलपर यह बात सदासे प्रचलित है ॥
मम चार्धं शरीरस्य तव चार्धेन निर्मितम् ।
सुरकार्यकरी च त्वं लोकसंतानकारिणी ॥ ११ ॥
मेरा आधा शरीर तुम्हारे आधे शरीरसे निर्मित हुआ है। तुम देवताओंका कार्य सिद्ध करनेवाली तथा लोक-संततिका विस्तार करनेवाली हो ॥ ११ ॥
(प्रमदोक्तं तु यत् किंचित् तत् स्त्रीषु बहु मन्यते ।
न तथा मन्यते स्त्रीषु पुरुषोक्तमनिन्दिते ॥)
अनिन्दिते! नारीकी कही हुई जो बात होती है, उसे ही स्त्रियोंमें अधिक महत्त्व दिया जाता है। पुरुषोंकी कही हुई बातको स्त्रियोंमें वैसा महत्त्व नहीं दिया जाता ॥
तव सर्वः सुविदितः स्त्रीधर्मः शाश्वतः शुभे ।
तस्मादशेषतो ब्रूहि स्वधर्मं विस्तरेण मे ॥ १२ ॥
शुभे! तुम्हें सम्पूर्ण सनातन स्त्रीधर्मका भलीभाँति ज्ञान है; अतः अपने धर्मका पूर्णरूपसे विस्तारपूर्वक मेरे आगे वर्णन करो ॥ १२ ॥
उमोवाच
भगवन् सर्वभूतेश भूतभव्यभवोत्तम ।