सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1347, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1347

उमोवाच
भगवल्लोँकपालेश धर्मस्तु कतिभेदकः ।
दृश्यते परितः सद्भिस्तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
उमाने कहा— भगवन्! लोकपालेश्वर! धर्मके कितने भेद हैं? साधु पुरुष सब ओर उसके कितने भेद देखते हैं? यह मुझे बताइये ॥

श्रीमहेश्वर उवाच
स्मृतिधर्मश्च बहुधा सद्भिदाचार इष्यते ॥
देशधर्माश्च दृश्यन्ते कुलधर्मास्तथैव च ।
जातिधर्माश्च वै धर्मा गणधर्माश्च शोभने ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— स्मृतिकथित धर्म अनेक प्रकारका है। श्रेष्ठ पुरुषोंको आचार-धर्म अभीष्ट होता है। शोभने! देश-धर्म, कुल-धर्म, जाति-धर्म तथा समुदाय-धर्म भी दृष्टिगोचर होते हैं ॥
शरीरकालवैषम्यादापद्धर्मश्च दृश्यते ।
एतद् धर्मस्य नानात्वं क्रियते लोकवासिभिः ॥
शरीर और कालकी विषमतासे आपद्धर्म भी देखा जाता है। इस जगत्में रहनेवाले मनुष्य ही धर्मके ये नाना भेद करते हैं ॥
तत्कारणसमायोगे लभेत् कुर्वन् फलं नरः ॥
कारणका संयोग होनेपर धर्माचरण करनेवाला मनुष्य उस धर्मके फलको प्राप्त करता है ॥
श्रौतस्मार्तस्तु धर्माणां प्रकृतो धर्म उच्यते ।
इति ते कथितं देवि भूयः श्रोतुं किमिच्छसि ॥
धर्मोंमें जो श्रौत (वेद-कथित) और स्मार्त (स्मृति-कथित) धर्म है, उसे प्रकृत धर्म कहते हैं। देवि! इस प्रकार तुम्हें धर्मकी बात बतायी गयी है। अब और क्या सुनना चाहती हो? ॥
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)