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सर्वकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1346, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1346

उमाने पूछा- भगवन्! अशुभदानका भी फल शुभ कैसे होता है? ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

मनसा तत्त्वतः शुद्धमानृशंस्यपुरस्सरम् ।

प्रीत्या तु सर्वदानानि दत्त्वा फलमवाप्नुयात् ।।

श्रीमहेश्वरने कहा- प्रिये! जो दान शुद्ध हृदयसे अर्थात् निष्काम भावसे दिये जानेके

कारण तत्त्वतः शुद्ध हो, जिसमें क्रूरताका अभाव हो, जो दयापूर्वक दिया गया हो, वह शुभ

फल देनेवाला है। सभी प्रकारके दानोंको प्रसन्नताके साथ देकर दाता शुभ फलका भागी

होता है ।।

रहस्यं सर्वदानानामेतद् विद्धि शुभेक्षणे ।

अन्यानि धर्मकार्याणि शृणु सद्भिः कृतानि च ।।

शुभेक्षणे! इसीको तुम सम्पूर्ण दानोंका रहस्य समझो। अब सत्पुरुषोंद्वारा किये गये

अन्य धर्म-कार्योंका वर्णन सुनो ।।

आरामदेवगोष्ठानि संक्रमाः कूप एव च ।

गोवाटश्च तटाकश्च सभा शाला च सर्वशः ।।

पाषण्डावसथश्चैव पानीयं गोतृणानि च ।

व्याधितानां च भैषज्यमनाथानां च पोषणम् ।।

अनाथशवसंस्कारस्तीर्थमार्गविशोधनम् ।

व्यसनाभ्यवपत्तिश्च सर्वेषां च स्वशक्तितः ।।

एतत् सर्वं समासेन धर्मकार्यमिति स्मृतम् ।

तत् कर्तव्यं मनुष्येण स्वशक्त्या श्रद्धया शुभे ।।

बगीचा लगाना, देवस्थान बनाना, पुल और कुआँका निर्माण करना, गोशाला, पोखरा,

धर्मशाला, सबके लिये घर, पाखण्डीतकको भी आश्रय देना, पानी पिलाना, गौओंको घास

देना, रोगियोंके लिये दवा और पथ्यकी व्यवस्था करना, अनाथ बालकोंका पालन-पोषण

करना, अनाथ मुर्दोंका दाह-संस्कार कराना, तीर्थ-मार्गका शोधन करना, अपनी शक्तिके

अनुसार सभीके संकटोंको दूर करनेका प्रयत्न करना-यह सब संक्षेपसे धर्मकार्य बताया

गया। शुभे! मनुष्यको अपनी शक्तिके अनुसार श्रद्धापूर्वक यह धर्मकार्य करना चाहिये ।।

प्रेत्यभावे लभेत् पुण्यं नास्ति तत्र विचारणा ।

रूपं सौभाग्यमारोग्यं बलं सौख्यं लभेन्नरः ।।

स्वर्गे वा मानुषे वापि तैस्तैराप्यायते हि सः ।।

यह सब करनेसे मृत्युके पश्चात् मनुष्यको पुण्य प्राप्त होता है, इसमें विचार करनेकी

आवश्यकता नहीं है। वह धर्मात्मा पुरुष रूप, सौभाग्य, आरोग्य, बल और सुख पाता है।

वह स्वर्गलोकमें रहे या मनुष्यलोकमें, उन-उन पुण्यफलोंसे तृप्त होता रहता है ।।