महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
Page 633 of 2450
Read in contextचतुर्नवतितमोऽध्यायः
वामदेवके उपदेशमें राजा और राज्यके लिये हितकर बर्ताव
वामदेव उवाच
अयुद्धेनैव विजयं वर्धयेद् वसुधाधिपः ।
जघन्यमाहुर्विजयं युद्धेन च नराधिप ॥ १ ॥
वामदेवजी कहते हैं—नरेश्वर! राजा युद्धके सिवा किसी और ही उपायसे पहले
अपनी विजय-वृद्धिकी चेष्टा करे; युद्धसे जो विजय प्राप्त होती है, उसे निम्न श्रेणीकी
बताया गया है ॥ १ ॥
न चाप्यलब्धं लिप्सेत मूले नातिदृढे सति ।
न हि दुर्बलमूलस्य राज्ञो लाभो विधीयते ॥ २ ॥
यदि राज्यकी जड़ मजबूत न हो तो राजाको अप्राप्त वस्तुकी प्राप्ति—अनधिकृत
देशोंपर अधिकारकी इच्छा नहीं करनी चाहिये; क्योंकि जिसके मूलमें ही दुर्बलता है, उस
राजाको वैसा लाभ होना सम्भव नहीं है ॥ २ ॥
यस्य स्फीतो जनपदः सम्पन्नः प्रियराजकः ।
संतुष्टपुष्टसचिवो दृढमूलः स पार्थिवः ॥ ३ ॥
जिस राजाका देश समृद्धिशाली, धनधान्यसे सम्पन्न, राजाको प्रिय माननेवाले
मनुष्योंसे परिपूर्ण और हृष्ट-पुष्ट मन्त्रियोंसे सुशोभित है, उसीकी जड़ मजबूत समझनी
चाहिये ॥ ३ ॥
यस्य योधाः सुसंतुष्टाः सान्त्विताः सूपधास्थिताः ।
अल्पेनापि स दण्डेन महीं जयति पार्थिवः ॥ ४ ॥
जिसके सैनिक संतुष्ट, राजाके द्वारा सान्त्वना-प्राप्त और शत्रुओंको धोखा देनेमें चतुर
हों, वह भूपाल थोड़ी-सी सेनाके द्वारा भी पृथ्वीपर विजय पा लेता है ॥
(दण्डो हि बलवान् यत्र तत्र साम प्रयुज्यते ।
प्रदानं सामपूर्वं च भेदमूलं प्रशस्यते ॥
जिस स्थानपर शत्रुपक्षकी सेना अधिक प्रबल हो, वहाँ पहले सामनीतिका ही प्रयोग
करना उचित है। यदि उससे काम न चले तो धन या उपहार देनेकी नीतिको अपनाना
चाहिये। इस दाननीतिके मूलमें भी यदि भेदनीतिका समावेश हो अर्थात् शत्रुओंमें फूट
डालनेकी चेष्टा की जा रही हो तो उसे उत्तम माना गया है ।।
त्रयाणां विफलं कर्म यदा पश्येत भूमिपः ।
रन्ध्रं ज्ञात्वा ततो दण्डं प्रयुञ्जीताविचारयन् ॥)