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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,450 pages

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अष्टमोऽध्यायः

अर्जुनका युधिष्ठिरके मतका निराकरण करते हुए उन्हें धनकी महत्ता बताना और राजधर्मके पालनके लिये जोर देते हुए यज्ञानुष्ठानके लिये प्रेरित करना

वैशम्पायन उवाच

अथार्जुन उवाचेदमधिक्षिप्त इवाक्षमी ।
अभिनीततरं वाक्यं दृढवादपराक्रमः ॥ १ ॥
दर्शयन्नैन्द्रिरात्मानमुग्रमुग्रपराक्रमः ।
स्मयमानो महातेजाः सृक्किणी परिसंलिहन् ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! युधिष्ठिरकी यह बात सुनकर अर्जुन इस प्रकार असहिष्णु हो उठे, मानो उनपर कोई आक्षेप किया गया हो। वे बातचीत करने या पराक्रम दिखानेमें किसीसे दबनेवाले नहीं थे। उनका पराक्रम बड़ा भयंकर था। वे महातेजस्वी इन्द्रकुमार अपने उग्ररूपका परिचय देते और दोनों गलफरोंको चाटते हुए मुसकराकर इस तरह गर्वयुक्त वचन बोलने लगे, जैसे नाटकके रंगमंचपर अभिनय कर रहे हों ॥ १-२ ॥

अर्जुन उवाच

अहो दुःखमहो कृच्छ्रमहो वैक्लव्यमुत्तमम् ।
यत् कृत्वामानुषं कर्म त्यजेथाः श्रियमुत्तमाम् ॥ ३ ॥
**अर्जुनने कहा—**राजन्! यह तो बड़े भारी दुःख और महान् कष्टकी बात है। आपकी विह्वलता तो पराकाष्ठाको पहुँच गयी। आश्चर्य है कि आप अलौकिक पराक्रम करके प्राप्त की हुई इस उत्तम राजलक्ष्मीका परित्याग कर रहे हैं ॥ ३ ॥

शत्रून् हत्वा महीं लब्ध्वा स्वधर्मेणोपपादिताम् ।
एवंविधं कथं सर्वं त्यजेथा बुद्धिलाघवात् ॥ ४ ॥
आपने शत्रुओंका संहार करके इस पृथ्वीपर अधिकार प्राप्त किया है। यह राज्यलक्ष्मी आपको अपने धर्मके अनुसार प्राप्त हुई है। इस प्रकार जो यह सब कुछ आपके हाथमें आया है, इसे आप अपनी अल्पबुद्धिके कारण क्यों छोड़ रहे हैं? ॥ ४ ॥

क्लीबस्य हि कुतो राज्यं दीर्घसूत्रस्य वा पुनः ।
किमर्थं च महीपालानवधीः क्रोधमूर्च्छितः ॥ ५ ॥
किसी कायर या आलसीको कैसे राज्य प्राप्त हो सकता है? यदि आपको यही करना था तो किसलिये क्रोधसे विकल होकर इतने राजाओंका वध किया और कराया? ॥ ५ ॥