महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextएकोनसप्ततितमोऽध्यायः
राजाके प्रधान कर्तव्योंका तथा दण्डनीतिके द्वारा युगोंके निर्माणका वर्णन
युधिष्ठिर उवाच
पार्थिवेन विशेषेण किं कार्यमवशिष्यते ।
कथं रक्ष्यो जनपदः कथं जेयाश्च शत्रवः ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! राजाके द्वारा विशेष रूपसे पालन करने योग्य और कौन-सा कार्य शेष है? उसे गाँवोंकी रक्षा कैसे करनी चाहिये और शत्रुओंको किस प्रकार जीतना चाहिये? ॥ १ ॥
कथं चारं प्रयुञ्जीत वर्णान् विश्वासयेत् कथम् ।
कथं भृत्यान् कथं दारान् कथं पुत्रांश्च भारत ॥ २ ॥
राजा गुप्तचरकी नियुक्ति कैसे करे? सब वर्णोंके मनमें किस प्रकार विश्वास उत्पन्न करे? भारत! वह भृत्यों, स्त्रियों और पुत्रोंको भी कैसे कार्यमें लगावे? तथा उनके मनमें भी किस तरह विश्वास पैदा करे? ॥ २ ॥
भीष्म उवाच
राजवृत्तं महाराज शृणुष्वावहितोऽखिलम् ।
यत् कार्यं पार्थिवेनादौ पार्थिवप्रकृतेन वा ॥ ३ ॥
**भीष्मजीने कहा—**महाराज! क्षत्रिय राजा अथवा राजकार्य करनेवाले अन्य पुरुषको सबसे पहले जो कार्य करना चाहिये, वह सारा राजकीय आचार-व्यवहार सावधान होकर सुनो ॥ ३ ॥
आत्मा जेयः सदा राज्ञा ततो जेयाश्च शत्रवः ।
अजितात्मा नरपतिर्विजयेत कथं रिपून् ॥ ४ ॥
राजाको सबसे पहले सदा अपने मनपर विजय प्राप्त करनी चाहिये, उसके बाद शत्रुओंको जीतनेकी चेष्टा करनी चाहिये। जिस राजाने अपने मनको नहीं जीता, वह शत्रुपर विजय कैसे पा सकता है? ॥ ४ ॥
एतावानात्मविजयः पञ्चवर्गविनिग्रहः ।
जितेन्द्रियो नरपतिर्बाधितुं शक्नुयादरीन् ॥ ५ ॥
श्रोत्र आदि पाँचों इन्द्रियोंको वशमें रखना यही मनपर विजय पाना है। जितेन्द्रिय नरेश ही अपने शत्रुओंका दमन कर सकता है ॥ ५ ॥
न्यसेत गुल्मान् दुर्गैषु सन्धौ च कुरुनन्दन ।