महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextचतुरशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा
जनमेजय उवाच
प्राचेतसस्य दक्षस्य कथं वैवस्वतेऽन्तरे ।
विनाशमगमद् ब्रह्मन् हयमेधः प्रजापतेः ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा— ब्रह्मन्! वैवस्वत मन्वन्तरमें प्रचेताओेंके पुत्र दक्षप्रजापतिका अश्वमेध यज्ञ कैसे नष्ट हो गया? ॥ १ ॥
देव्या मन्युकृतं मत्वा क्रुद्धः सर्वात्मकः प्रभुः ।
प्रसादात् तस्य दक्षेण स यज्ञः संधितः कथम् ।
एतद् वेदितुमिच्छेयं तन्मे ब्रूहि यथातथम् ॥ २ ॥
दक्षके यज्ञमें मेरा आवाहन न होना पार्वतीके दुःखका कारण बन गया है—यह जानकर भगवान् शंकर, जो सम्पूर्ण प्राणियोंके आत्मा हैं, जब कुपित हो उठे, तब फिर उन्हींकी कृपापूर्ण प्रसन्नतासे दक्ष-प्रजापतिका यह यज्ञ कैसे सम्पन्न हुआ? मैं यह वृत्तान्त जानना चाहता हूँ, आप इसे यथार्थ रूपसे बतानेकी कृपा करें ॥ २ ॥
वैशम्पायन उवाच
पुरा हिमवतः पृष्ठे दक्षो वै यज्ञमाहरत् ।
गङ्गाद्वारे शुभे देशे ऋषिसिद्धनिषेविते ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— प्राचीन कालकी बात है—हिमालयके पार्श्ववर्ती गङ्गाद्वार (हरिद्वार) के शुभ देशमें, जहाँ ऋषियों तथा सिद्ध पुरुषोंका निवास है, प्रजापति दक्षने अपने यज्ञका आयोजन किया था ॥ ३ ॥
गन्धर्वाप्सरसाकीर्णे नानाद्रुमलतावृते ।
ऋषिसङ्घैः परिवृतं दक्षं धर्मभृतां वरम् ॥ ४ ॥
पृथिव्यामन्तरिक्षे च ये च स्वर्लोकवासिनः ।
सर्वे प्राञ्जलयो भूत्वा उपतस्थुः प्रजापतिम् ॥ ५ ॥
वह स्थान गन्धर्वों और अप्सराओंसे भरा था। भाँति-भाँतिके वृक्षसमूह और लताएँ वहाँ सब ओर छा रही थीं। धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ प्रजापति दक्ष ऋषिसमुदायसे घिरे हुए बैठे।