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सर्वकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1447, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1447

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द्वाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

सनत्कुमारजीका ऋषियोंको भगवत्स्वरूपका उपदेश देना

युधिष्ठिर उवाच

केचिदाहुर्द्विजा लोके त्रिधा राजन्ननेकधा ।
न प्रत्ययो न चान्यच्च दृश्यते ब्रह्म नैव तत् ॥
नानाविधानि शास्त्राणि युक्ताश्चैव पृथग्विधाः ।
किमधिष्ठाय तिष्ठामि तन्मे ब्रूहि पितामह ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**राजन्! जगत्में कुछ विद्वान् जड और चेतन अथवा प्रकृति और पुरुष दो तत्त्वोंका प्रतिपादन करते हैं। कुछ लोग जीव, ईश्वर और प्रकृति—इन तीन तत्त्वोंका वर्णन करते हैं और कितने ही विद्वान् अनेक तत्त्वोंका निरूपण करते रहते हैं; अतः कहीं न विश्वास किया जा सकता है, न अविश्वास। इसके सिवा वह परब्रह्म परमात्मा दिखायी नहीं देता है। नाना प्रकारके शास्त्र हैं और भिन्न-भिन्न प्रकारसे उनका वर्णन किया गया है; इसलिये पितामह! मैं किस सिद्धान्तका आश्रय लेकर रहूँ, यह मुझे बताइये ॥

भीष्म उवाच

स्वे स्वे युक्ता महात्मानः शास्त्रेषु प्रभविष्णवः ।
वर्तन्ते पण्डिता लोके को विद्वान् कश्च पण्डितः ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! शास्त्रोंके विचारमें प्रभावशाली सभी महात्मा अपने-अपने सिद्धान्तके प्रतिपादनमें स्थित हैं। ऐसे पण्डित इस जगत्में बहुत हैं; परंतु उनमें वास्तवमें कौन तत्त्वको जाननेवाला विद्वान् है और कौन शास्त्रचर्चामें पण्डित है? यह कहना कठिन है ॥

सर्वेषां तत्त्वमज्ञाय यथारुचि तथा भवेत् ।
अस्मिन्नर्थे पुराभूतमितिहासं पुरातनम् ॥
महाविवादसंयुक्तमृषीणां भावितात्मनाम् ।
सबके तत्त्वको भलीभाँति समझकर जैसी रुचि हो, उसीके अनुसार आचरण करे। इस विषयमें एक प्राचीन इतिहास प्रसिद्ध है। एक समय बहुत-से भावितात्मा मुनियोंका इसी विषयको लेकर आपसमें बड़ा भारी वाद-विवाद हुआ था ॥

हिमवत्पार्श्व आसीना ऋषयः संशितव्रताः ॥
षण्णां तानि सहस्राणि ऋषीणां गणमाहितम् ।
हिमालय पर्वतके पार्श्वभागमें कठोर व्रतका पालन करनेवाले छः हजार ऋषियोंकी एक बैठक हुई थी ॥