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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,450 pages

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षोडशाधिकद्विशततमोऽध्यायः

स्वप्न और सुषुप्ति-अवस्थामें मनकी स्थिति तथा गुणातीत ब्रह्मकी प्राप्तिका उपाय

भीष्म उवाच

निष्कल्मषं ब्रह्मचर्यमिच्छता चरितुं सदा ।
निद्रा सर्वात्मना त्याज्या स्वप्नदोषानवेक्षता ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! सदा निष्कलंक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करनेकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको स्वप्नके दोषोंपर दृष्टि रखते हुए सब प्रकारसे निद्राका परित्याग कर देना चाहिये ॥ १ ॥

स्वप्ने हि रजसा देही तमसा चाभिभूयते ।
देहान्तरमिवापन्नश्चरत्युपगतस्पृहः ॥ २ ॥
स्वप्नमें जीवको प्रायः रजोगुण और तमोगुण दबा लेते हैं। वह कामनायुक्त होकर दूसरे शरीरको प्राप्त हुएकी भाँति विचरता है ॥ २ ॥

ज्ञानाभ्यासाज्जागरणं जिज्ञासाधर्मनन्तरम् ।
विज्ञानाभिनिवेशात्तु स जागर्त्यनिशं सदा ॥ ३ ॥
मनुष्यमें पहले तो ज्ञानका अभ्यास करनेसे जागनेकी आदत होती है, तत्पश्चात् विचार करनेके लिये जागना अनिवार्य हो जाता है तथा जो तत्त्वज्ञान प्राप्त कर लेता है, वह तो ब्रह्ममें निरन्तर जागता ही रहता है ॥ ३ ॥

अत्राह को न्वयं भावः स्वप्ने विषयवानिव ।
प्रलीनैरिन्द्रियैर्देही वर्तते देहवानिव ॥ ४ ॥
यहाँ पूर्व पक्ष यह प्रश्न उठाता है कि स्वप्नमें जो यह देहादि पदार्थ दिखायी देता है, क्या है? (सत्य है या असत्य? यदि कहें कि सत्य है तो ठीक नहीं; क्योंकि) स्वप्नावस्थामें सब कुछ विषयोंसे सम्पन्न-सा दिखायी देनेपर भी वास्तवमें वहाँ कोई विषय नहीं होता, सारी इन्द्रियाँ उस समय मनमें विलीन हो जाती हैं। उन्हीं इन्द्रियोंसे देहाभिमानी जीव देहधारी-जैसा बर्ताव करता है। और यदि कहें कि स्वप्नके पदार्थ असत्य हैं तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि जो सर्वथा असत् है, (जैसे आकाशका पुष्प) उसकी प्रतीति ही नहीं होती ॥ ४ ॥

अत्रोच्यते यथा ह्येतद् वेद योगेश्वरो हरिः ।
तथैतदुपपन्नार्थं वर्णयन्ति महर्षयः ॥ ५ ॥
अब यहाँ सिद्धान्तका प्रतिपादन किया जाता है। यह स्वप्न-जगत् जैसा है, उसे ठीक-ठीक योगेश्वर श्रीहरि ही जानते हैं; पर जैसा श्रीहरि जानते हैं, वैसा ही महर्षि भी उसका