Skip to content
SarvaKosh
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,450 pages

Page 1144 of 2450

Read in context
Page 1144

⬅ विषय-सूची (TOC)

षट्सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः

त्यागकी महिमाके विषयमें शम्पाक ब्राह्मणका उपदेश

युधिष्ठिर उवाच

धनिनश्चाधना ये च वर्तन्ते स्वतन्त्रिणः ।
सुखदुःखागमस्तेषां कः कथं वा पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! धनी और निर्धन दोनों स्वतन्त्रतापूर्वक व्यवहार करते हैं; फिर उन्हें किस रूपमें और कैसे सुख और दुःखकी प्राप्ति होती है? ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
शम्पाकेनेह मुक्तेन गीतं शान्तिगतेन च ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— युधिष्ठिर! इस विषयमें विद्वान् पुरुष इस पुरातन इतिहासका उदाहरण देते हैं, जिसे परम शान्त जीवन्मुक्त शम्पाकने यहाँ कहा था ॥ २ ॥

अब्रवीन्मां पुरा कश्चिद् ब्राह्मणस्त्यागमाश्रितः ।
क्लिश्यमानः कुदारेण कुचैलेन बुभुक्षया ॥ ३ ॥
पहलेकी बात है, फटे-पुराने वस्त्रों एवं अपनी दुष्टा स्त्रीके और भूखके कारण अत्यन्त कष्ट पानेवाले एक त्यागी ब्राह्मणने जिसका नाम शम्पाक था, मुझसे इस प्रकार कहा— ॥ ३ ॥

उत्पन्नमिह लोके वै जन्मप्रभृति मानवम् ।
विविधान्युपवर्तन्ते दुःखानि च सुखानि च ॥ ४ ॥
‘इस संसारमें जो भी मनुष्य उत्पन्न होता है (वह धनी हो या निर्धन) उसे जन्मसे ही नाना प्रकारके सुख-दुःख प्राप्त होने लगते हैं ॥ ४ ॥

तयोरेकतरे मार्गे यदेनमभिसन्नयेत् ।
न सुखं प्राप्य संहृष्येन्नासुखं प्राप्य संज्वरेत् ॥ ५ ॥
‘विधाता यदि उसे सुख और दुःख इन दोनोंमेंसे किसी एकके मार्गपर ले जाय तो वह न तो सुख पाकर प्रसन्न हो और न दुःखमें पड़कर परितप्त हो ॥ ५ ॥

न वै चरसि यच्छ्रेय आत्मनो वा यदीशिषे ।
अकामात्मापि हि सदा धुरमुद्यम्य चैव ह ॥ ६ ॥
‘तुम जो कामनारहित होकर भी अपने कल्याणका साधन नहीं कर रहे हो और मनको वशमें नहीं कर रहे हो, इसका कारण यही है कि तुमने राज्यका बोझा अपनेपर उठा रखा है ॥ ६ ॥