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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished3,237 pages

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Page 3008

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षष्ठोऽध्यायः

अश्वत्थामाका शिविर-द्वारपर एक अद्भुत पुरुषको देखकर उसपर अस्त्रोंका प्रहार करना और अस्त्रोंके अभावमें चिन्तित हो भगवान् शिवकी शरणमें जाना

धृतराष्ट्र उवाच

द्वारदेशे ततो द्रौणिमवस्थितमवेक्ष्य तौ ।
अकुर्वातां भोजकृपौ किं संजय वदस्व मे ॥ १ ॥
**धृतराष्ट्रने पूछा—**संजय! अश्वत्थामाको शिविरके द्वारपर खड़ा देख कृतवर्मा और कृपाचार्यने क्या किया? यह मुझे बताओ ॥ १ ॥

संजय उवाच

कृतवर्माणमामन्त्र्य कृपं च स महारथः ।
द्रौणिर्मन्युपरीतात्मा शिबिरद्वारमागमत् ॥ २ ॥
**संजयने कहा—**राजन्! कृतवर्मा और कृपाचार्यको आमन्त्रित करके महारथी अश्वत्थामा क्रोधपूर्ण हृदयसे शिविरके द्वारपर आया ॥ २ ॥

तत्र भूतं महाकायं चन्द्रार्कसदृशद्युतिम् ।
सोऽपश्यद् द्वारमाश्रित्य तिष्ठन्तं लोमहर्षणम् ॥ ३ ॥
वसानं चर्म वैयाघ्रं महारुधिरविस्रवम् ।
कृष्णाजिनोत्तरासङ्गं नागयज्ञोपवीतिनम् ॥ ४ ॥
बाहुभिः स्वायतैः पीनैर्नानाप्रहरणोद्यतैः ।
बद्धाङ्गदमहासर्पं ज्वालामालाकुलाननम् ॥ ५ ॥
दंष्ट्राकरालवदनं व्यादितास्यं भयानकम् ।
नयनानां सहस्रैश्च विचित्रैरभिभूषितम् ॥ ६ ॥
वहाँ उसने चन्द्रमा और सूर्यके समान तेजस्वी एक विशालकाय अद्भुत प्राणीको देखा, जो द्वार रोककर खड़ा था, उसे देखते ही रोंगटे खड़े हो जाते थे। उस महापुरुषने व्याघ्रका ऐसा चर्म धारण कर रखा था, जिससे बहुत अधिक रक्त चू रहा था, वह काले मृगचर्मकी चादर ओढ़े और सर्पोंका यज्ञोपवीत पहने हुए था। उसकी विशाल और मोटी भुजाएँ नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लिये प्रहार करनेको उद्यत जान पड़ती थीं। उनमें बाजूबंदोंके स्थानमें बड़े-बड़े सर्प बँधे हुए थे तथा उसका मुख आगकी लपटोंसे व्याप्त दिखायी देता था। उसने मुँह फैला रखा था, जो दाढ़ोंके कारण विकराल जान पड़ता था। वह भयानक पुरुष सहस्रों विचित्र नेत्रोंसे सुशोभित था ॥ ३—६ ॥