महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextद्वात्रिंशोऽध्यायः
युधिष्ठिरके कहनेसे दुर्योधनका तालाबसे बाहर होकर किसी एक पाण्डवके साथ गदायुद्धके लिये तैयार होना
धृतराष्ट्र उवाच
एवं संतर्ज्यमानस्तु मम पुत्रो महीपतिः ।
प्रकृत्या मन्युमान् वीरः कथमासीत् परंतपः ॥ १ ॥
**धृतराष्ट्रने पूछा—**संजय! शत्रुओंको संताप देनेवाला मेरा वीर पुत्र राजा दुर्योधन स्वभावसे ही क्रोधी था। जब युधिष्ठिरने उसे इस प्रकार फटकारा, तब उसकी कैसी दशा हुई? ॥ १ ॥
न हि संतर्जना तेन श्रुतपूर्वा कथञ्चन ।
राजभावेन मान्यश्च सर्वलोकस्य सोऽभवत् ॥ २ ॥
उसने पहले कभी किसी तरह ऐसी फटकार नहीं सुनी थी; क्योंकि राजा होनेके कारण वह सब लोगोंके सम्मानका पात्र था ॥ २ ॥
यस्यातपत्रच्छायापि स्वका भानोस्तथा प्रभा ।
खेदायैवाभिमानित्वात् सहेत् सैवं कथं गिरः ॥ ३ ॥
अभिमानी होनेके कारण जिसके मनमें अपने छत्रकी छाया और सूर्यकी प्रभा भी खेद ही उत्पन्न करती थी, वह ऐसी कठोर बातें कैसे सह सकता था? ॥
इयं च पृथिवी सर्वा सम्लेच्छाटविका भृशम् ।
प्रसादाद् ध्रियते यस्य प्रत्यक्षं तव संजय ॥ ४ ॥
संजय! तुमने तो प्रत्यक्ष ही देखा था कि म्लेच्छों तथा जंगली जातियोंसहित यह सारी पृथ्वी दुर्योधनकी कृपासे ही जीवन धारण करती थी ॥ ४ ॥
स तथा तर्ज्यमानस्तु पाण्डुपुत्रैर्विशेषतः ।
विहीनश्च स्वकैर्भृत्यैर्निर्जने चावृतो भृशम् ॥ ५ ॥
स श्रुत्वा कटुका वाचो जययुक्ताः पुनः पुनः ।
किमब्रवीत् पाण्डवेयांस्तन्ममाचक्ष्व संजय ॥ ६ ॥
इस समय वह अपने सेवकोंसे हीन हो चुका था और एकान्त स्थानमें घिर गया था। उस दशामें विशेषतः पाण्डवोंने जब उसे वैसी कड़ी फटकार सुनायी, तब शत्रुओंके विजयसे युक्त उन कटुवचनोंको बारंबार सुनकर दुर्योधनने पाण्डवोंसे क्या कहा? यह मुझे बताओ ॥
संजय उवाच
तर्ज्यमानस्तदा राजन्नुदकस्थस्तवात्मजः ।