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सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 2674, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 2674

रहे थे॥ ५६॥
ते सर्वे मामभिप्रेक्ष्य तूर्णमश्वाननोदयन्।
उपायाय तु मामूचुर्दिष्ट्या जीवसि संजय॥ ५७॥
मुझे देखते ही उन तीनोंने शीघ्रतापूर्वक अपने घोड़े बढ़ाये और निकट आकर मुझसे कहा—'संजय! सौभाग्यकी बात है कि तुम जीवित हो'॥ ५७॥
अपृच्छंश्चैव मां सर्वे पुत्रं तव जनाधिपम्।
कच्चिद् दुर्योधनो राजा स नो जीवति संजय॥ ५८॥
फिर उन सबने आपके पुत्र राजा दुर्योधनका समाचार पूछा—'संजय! क्या हमारे राजा दुर्योधन जीवित हैं?'॥ ५८॥
आख्यातवानहं तेभ्यस्तदा कुशलिनं नृपम्।
तच्चैव सर्वमाचक्षं यन्मां दुर्योधनोऽब्रवीत्॥ ५९॥
ह्रदं चैवाहमाचक्षं यं प्रविष्टो नराधिपः।
तब मैंने उन लोगोंसे दुर्योधनका कुशल-समाचार बताया तथा दुर्योधनने मुझे जो संदेश दिया था, वह भी सब उनसे कह सुनाया और जिस सरोवरमें वह घुसा था, उसका भी पता बता दिया॥ ५९ १/२॥
अश्वत्थामा तु तद् राजन् निशम्य वचनं मम॥ ६०॥
तं ह्रदं विपुलं प्रेक्ष्य करुणं पर्यदेवयत्।
अहोधिङ् स न जानाति जीवतोऽस्मान् नराधिपः॥ ६१॥
पर्याप्ता हि वयं तेन सह योधयितुं परान्।
राजन्! मेरी बात सुनकर अश्वत्थामाने उस विशाल सरोवरकी ओर देखा और करुण विलाप करते हुए कहा—'अहो! धिक्कार है, राजा दुर्योधन नहीं जानते हैं कि हम सब जीवित हैं। उनके साथ रहकर हमलोग शत्रुओंसे जूझनेके लिये पर्याप्त हैं'॥ ६०-६१ १/२॥
ते तु तत्र चिरं कालं विलप्य च महारथाः॥ ६२॥
प्राद्रवन् रथिनां श्रेष्ठा दृष्ट्वा पाण्डुसुतान् रणे।
तत्पश्चात् वे महारथी दीर्घकालतक वहाँ विलाप करते रहे। फिर रणभूमिमें पाण्डवोंको आते देख वे रथियोंमें श्रेष्ठ तीनों वीर वहाँसे भाग निकले॥ ६२ १/२॥
ते तु मां रथमारोप्य कृपस्य सुपरिष्कृतम्॥ ६३॥
सेनानिवेशमाजग्मुर्हतशेषास्त्रयो रथाः।
तत्र गुल्माः परित्रस्ताः सूर्ये चास्तमिते सति॥ ६४॥
सर्वे विचुक्रुशुः श्रुत्वा पुत्राणां तव संक्षयम्।