महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextत्रिसप्ततितमोऽध्यायः
भीष्म और द्रोणके पराक्रमका वर्णन करते हुए अर्जुनके बलकी प्रशंसा करके श्रीकृष्णका कर्ण और दुर्योधनके अन्यायकी याद दिलाकर अर्जुनको कर्णवधके लिये उत्तेजित करना
संजय उवाच
ततः पुनरमेयात्मा केशवोऽर्जुनमब्रवीत् ।
कृतसंकल्पमायान्तं वधे कर्णस्य भारत ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— भरतनन्दन! तदनन्तर कर्णका वध करनेके लिये कृतसंकल्प होकर जाते हुए अर्जुनसे अप्रमेयस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णने पुनः इस प्रकार कहा ॥ १ ॥
अद्य सप्तदशाहानि वर्तमानस्य भारत ।
विनाशस्यातिघोरस्य नरवारणवाजिनाम् ॥ २ ॥
‘भारत! मनुष्यों, हाथियों और घोड़ोंका जो यह अत्यन्त भयंकर विनाश चल रहा है, इसे आज सत्रह दिन हो गये ॥ २ ॥
भूत्वा हि विपुला सेना तावकानां परैः सह ।
अन्योन्यं समरं प्राप्य किंचिच्छेषा विशाम्पते ॥ ३ ॥
‘प्रजानाथ! शत्रुओंके साथ-साथ तुमलोगोंके पास भी विशाल सेना जुट गयी थी; परंतु परस्पर युद्ध करके प्रायः नष्ट हो गयी, अब थोड़ी-सी ही शेष रह गयी है ॥ ३ ॥
भूत्वा वै कौरवाः पार्थ प्रभूतगजवाजिनः ।
त्वां वै शत्रुं समासाद्य विनष्टा रणमूर्धनि ॥ ४ ॥
‘पार्थ! कौरवपक्षके योद्धा बहुसंख्यक हाथी-घोड़ोंसे सम्पन्न थे, परंतु तुम-जैसे वीर शत्रुको पाकर युद्धके मुहानेपर नष्ट हो गये ॥ ४ ॥
एते ते पृथिवीपालाः सृञ्जयाश्च समागताः ।
त्वां समासाद्य दुर्धर्षं पाण्डवाश्च व्यवस्थिताः ॥ ५ ॥
‘तुम शत्रुओंके लिये दुर्जय हो, तुम्हारे ही आश्रयमें रहकर ये तुम्हारे पक्षके भूमिपाल सृंजय और पाण्डव-योद्धा युद्धस्थलमें डटे हुए हैं ॥ ५ ॥
पाञ्चालैः पाण्डवैर्मत्स्यैः कारूषैश्चेदिभिः सह ।
त्वया गुप्तैरमित्रघ्नैः कृतः शत्रुगणक्षयः ॥ ६ ॥
‘तुमसे सुरक्षित हुए इन पाण्डव, पांचाल, मत्स्य, करूष तथा चेदिदेशीय शत्रुनाशक वीरोंने शत्रुसमूहोंका संहार कर डाला है ॥ ६ ॥