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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished3,237 pages

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एकसप्ततितमोऽध्यायः

अर्जुनसे भगवान् श्रीकृष्णका उपदेश, अर्जुन और युधिष्ठिरका प्रसन्नतापूर्वक मिलन एवं अर्जुनद्वारा कर्णवधकी प्रतिज्ञा, युधिष्ठिरका आशीर्वाद

संजय उवाच

धर्मराजस्य तच्छ्रुत्वा प्रीतियुक्तं वचस्ततः ।
पार्थं प्रोवाच धर्मात्मा गोविन्दो यदुनन्दनः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—महाराज! धर्मराजके मुखसे यह प्रेमपूर्ण वचन सुनकर यदुकुलको आनन्दित करनेवाले धर्मात्मा गोविन्द अर्जुनसे कुछ कहने लगे ॥ १ ॥

इति स्म कृष्णवचनात् प्रत्युच्चार्य युधिष्ठिरम् ।
बभूव विमनाः पार्थः किंचित् कृत्वेव पातकम् ॥ २ ॥
अर्जुन श्रीकृष्णके कहनेसे युधिष्ठिरके प्रति जो तिरस्कारपूर्ण वचन बोले थे, इसके कारण वे मन-ही-मन ऐसे उदास हो गये थे मानो कोई पाप कर बैठे हों ॥

ततोऽब्रवीद् वासुदेवः प्रहसन्निव पाण्डवम् ।
कथं नाम भवेदेतद् यदि त्वं पार्थ धर्मजम् ॥ ३ ॥
असिना तीक्ष्णधारेण हन्या धर्मे व्यवस्थितम् ।
त्वमित्युक्त्वाथ राजानमेवं कश्मलमाविशः ॥ ४ ॥
उनकी यह अवस्था देख भगवान् श्रीकृष्ण हँसते हुए-से उन पाण्डुकुमारसे बोले—'पार्थ! तुम तो राजाके प्रति केवल 'तू' कह देनेमात्रसे ही इस प्रकार शोकमें डूब गये हो। फिर यदि धर्ममें स्थित रहनेवाले धर्मकुमार युधिष्ठिरको तीखी धारवाले तलवारसे मार डालते, तब तुम्हारी दशा कैसी हो जाती? ॥ ३-४ ॥

हत्वा तु नृपतिं पार्थ अकरिष्यः किमुत्तरम् ।
एवं हि दुर्विदो धर्मो मन्दप्रज्ञैर्विशेषतः ॥ ५ ॥
'कुन्तीनन्दन! तुम राजाका वध करनेके पश्चात् क्या करते? इस तरह धर्मका स्वरूप सभीके लिये दुर्विज्ञेय है। विशेषतः उन लोगोंके लिये, जिनकी बुद्धि मन्द है, उसके सूक्ष्म स्वरूपको समझना अत्यन्त कठिन है ॥ ५ ॥

स भवान् धर्मभीरुत्वाद् ध्रुवमैष्यन्महत्तमः ।
नरकं घोररूपं च भ्रातुर्ज्येष्ठस्य वै वधात् ॥ ६ ॥
'अतः तुम धर्मभीरु होनेके कारण अपने ज्येष्ठ भाईके वधसे निश्चय ही घोर नरकरूप महान् अन्धकार (दुःख)-में डूब जाते ॥ ६ ॥